सोमवार, 29 जून 2015

सूरज का कोप


30 June 2015
07:44

-इंदु बाला सिंह

सूरज के कोप से कुम्हलाई धरती देख
रात में रो पड़ा  बादल
नदी बौखला गयी ..................
सुबह
चकित सूरज ने देखा
यह विध्वंश .....................
सूरजमुखी गुम गयी थी
छतों पर नाचनेवाले मोर अदृश्य थे
मुंडेरों पर गिद्ध बैठे थे |

स्कूल की लाईब्रेरी


29 June 2015
22:23

-इंदु बाला सिंह


याद आती है
कभी कभी अपने स्कूल के लाइब्रेरी की
जिसने चटवा दिया था
मुझे
रवीन्द्र नाथ टैगोर , बंकिम चन्द्र चैटर्जी , प्रेमचन्द , यशपाल जैन के साहित्य को
और
अब आँखों के सामने हैं
आज के स्कूल
उसकी हिन्दी साहित्य से अछूती लाइब्रेरी
हिन्दी साहित्य से हैं अछूते छात्रगण
अब किसे दोष दूं
समझ न आये मुझे |

रविवार, 28 जून 2015

मिट्टी की सोंधी महक


28 June 2015
15:27



-इंदु बाला सिंह


अभावग्रस्त की भूख
रेगिस्तान है
आये दिन
इस में रेत की आंधियां चलती हैं |
यहां 
भक्ति के फूल नहीं खिलते .......
प्रेम की खुशबू नहीं उड़ती .......
यहाँ तो खिलते हैं
केवल
भूख के फूल |
हर अभावग्रस्त को 
इन्तजार है
अपने
स्वप्निल बरसात का |
वह भूखा है
उसे छेड़ना मत
आज भी इन्तजार कर रहा है वह
मिट्टी की उस सोंधी महक का
जिसके बारे में
उसने
अपनी लोककथाओं में सुना था |



शुक्रवार, 26 जून 2015

सच और झूठ की अजीब सी कहानी


27 June 2015
10:20


-इंदु बाला सिंह


सच को झूठ बतलानेवाले इतने बढ़े
कि
एक दिन
झूठ राजा हो  गया
और
सच जंगल में रहने चला गया ........
चाची से
यह अजीब सी कहानी सुन
बीस वर्षीया युवती के मन में प्रश्न उठा .........
कभी ऐसा भी होता है क्या !
वह पलट कर देखी
खटिये पे सोयी अपनी चाची को
जो अब खरांटे निकालने में व्यस्त थी |
नींद उड़ गयी युवती की
वह अपने लैपटॉप में

अपनी मनपसन्द फिल्म फिर से देखने लगी |

बुधवार, 24 जून 2015

रात में इन्द्रधनुष


25 June 2015
07:39
-इंदु बाला सिंह

अहा !
पानी का फौव्वारा छूटा
ओहो ! लग गया फौव्वारा हमारे पार्क में
किलका मुन्ना .......
अहा !
ये लाल हुआ पानी
अरे ! ये पीला हो गया पानी
अब तो हरा हुआ पानी
अरे रे ! अब नीला हो गया पानी
चहक उठा मुन्ना .......
अरे ! माँ देखो
हमारा 
रात के अंधेरे में डूबा पार्क
इन्द्रधनुषी हो गया |

मंगलवार, 23 जून 2015

नौकरीपेशा


24 June 2015
10:47


-इंदु बाला सिंह


माँ और मिट्टी को छोड़
चले जाता है
नौकरीपेशा
दूर जीने के लिये  
और
उनकी खुशबू
कभी पुकारती  है
तो
कभी राह दिखती है उसे ......
नौकरीपेशा को
कभी कभी उदासी के पलों में
अपने झरोखे से
मुस्काती माँ और मिट्टी भी दिख जाती है ....................
' कर्म ही जीवन है ' की नसीहत बंधी गाँठ के गमछे से पोंछ अपने श्रम का पसीना
नौकरीपेशा धन्यवाद देता है
अपने समय को
कम से कम अपने सहपाठियों की तरह
वह
बेरोजगार तो नहीं है |

सोमवार, 22 जून 2015

बिटिया ही बनाना


23 June 2015
12:10

-इंदु बाला सिंह

हर जन्म
मुझे बिटिया ही बनाना
ओ सर्वशक्तिमान !
बनूं मैं माँ
समझूं
दर्द बेटी का
और
कार्यक्षेत्र बेटे का |