शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

मोटर साइकिल चालक


30 January 2015
10:19
-इंदु बाला सिंह


मोटर साइकिल पर
पीछे बैठनेवाले तो द्पट्टा से बचा लेते हैं अपना सिर
तकलीफ तो चालक को होती है
जिसे सिर पर हौदा उलट कर चलना पड़ता है |

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

शाप


30 January 2015
06:40



-इंदु बाला सिंह

लोक कथायें कहती हैं
कि
कमजोर के दिये शाप प्रतिफलित होते हैं
अगर यह सच है
तो
आज कोई कमजोर न रहता
मात्र मुट्ठी भर आबादी शक्तिशाली न रहती
उनके पास धन का संचय न रहता
सड़क पर रिरियाता बचपन
और
पुलिया पर बैठे बुजुर्ग अपने खोये सपने न तलाशते |



सपने सच हो जाते हैं


29 January 2015
22:51


-इंदु बाला सिंह



कभी कभी हम इतना विश्वास

और आशा रख लेते हैं

किसी सुखद परिवर्त्तन पर

कि

हमारी वे अपूर्ण आशायें

हमें आक्रामक व अस्थिर बना देती हैं

बेहतर है हम भिड़ जायें समय से

पूरी ताकत से ........

हमारी आकांक्षायें पूरी होंगीं

अवश्य पूरी होंगीं हमारी चाहतें

क्योंकि

सपने सच हो जाते हैं


गर हमारे मन में दृढ निश्चय और स्थिरता हो |

कमजोर नसें


29 January 2015
18:43
-इंदु बाला सिंह

सबके अपने अपने दुःख हैं

छूना न

स्त्री और निम्न वर्ग को

ये कमजोर नसें हैं

समाज की

वर्ना

मिट जायेगा इंसान |

बुधवार, 28 जनवरी 2015

गुड़ाकूवाली


29 January 2015
12:56

-इंदु बाला सिंह

गुड़ाकू करते हुये आती थी
वह कामवाली
और
गुड़ाकू करते हुये जाती भी थी .............
मुहल्ले में उसका नाम ही पड़ गया था
' गुड़ाकूवाली '
मुंह से लार टपकाते हुये चलती थी वह
फिर भी उसे काम मिल जाता था घरों में
एक दिन दिखी वह
चेहरा सफ़ेद था उसका
पर 
मुंह लाल न था गुड़ाकू से
सुना मैंने उसका आदमी गुजर गया है .......
अब वह चुपचाप गुजरती थी सड़क पर से इधर उधर देखते हुये
पुराने चेहरों में अपनापन टटोलते हुये
उसकी
चाल की तेजी गुम गयी थी |

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

बड़ी गरीबी झेला हूं


27 January 2015
16:42

-इंदु बाला सिंह


अरे यार !
थक गये कान
अब तो
सुन सुन के सबकी गरीबी .......
जिसे देखो वही आलाप रहा है
मैं बड़ी गरीबी झेला हूं
अपने बचपन में .......
अरे !
तुम गरीब थे
तो मेरा क्यों दिमाग चाट रहे हो ?
क्यों अपमानित कर रहे हो इस धरती के करोड़ों अभावग्रस्त व्यक्तियों को ?
अरे !
आदमी तो मन से गरीब होता है
धन से नहीं |

बच्चे हैं तो हर दिवस है


26 January 2015
06:49
-इंदु बाला सिंह

बच्चे बताते
स्कूल झंडा लहराते
दूरदर्शन दिखाता हमें
दिल्ली का फहरता झंडा
गुजरती झांकियां
मुहल्ले में हमारे
मन जाता महिलाओं का गणतंत्र दिवस
और
पुरुष
निर्लिप्त से रहते
अपने काम में व्यस्त रहते
कामवालियां का कैसा गणतन्त्र दिवस !
क्या वे मास्टरनी हैं !
बच्चे हों
तो
हर दिवस है
वर्ना
हमारे घरों में
गणतन्त्र दिवस के दिन भी होता इतवार |