मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

अंजुरी भर जल


16 December 2014
20:40
-इंदु बाला सिंह

यह कैसी विडम्बना है
जीते जी
तरसें जन्मदाता
बेटे बहु के हाथ से पीने को जल
पर
मरणोपरांत
वे अजूरी से जल पिलायें |

कितने सपने हम खो देते


16 December 2014
19:37
-इंदु बाला सिंह


दिल में भाप सी उठ रही है
कलम कांप रही है ........
कितनी आशा से भेजा होगा स्कूल पढ़ने अपनों ने .......
कुछ दिनों तक बैठा रहेगा जी
हर शिक्षक का .........
कहीं गोली चली थी स्कूल में
छात्र लुढ़के थे पल भर में
कोई बच्चा हैरत से देखा था होगा गिरते किसी छात्र को
कोई घर पत्थर बन गया
तो
कोई घर बिलख उठा
ये कैसा युद्ध है ?.......
रोटी के लिये खटते खटते
न जाने कितने सपने हम खो देते |

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

बेटी को हिस्सा नहीं देते हम


16 December 2014
11:57

-इंदु बाला सिंह

तीन बेटियां थी ब्याह दिया ......
अरे ! इतने बड़े नहीं हम कि बेटियां पढ़ायें ......
एक बेटा है पढ़ रहा है
जितना चाहेगा पढ़ेगा
गांव में खेत है बंटने की गुंजाईश नहीं
एक ही बेटा है न
सब तो उसी का है ...
हम लोग बेटी को थोड़े न हिस्सा देते हैं ...
बेटी को बार बार देना पड़ता है न जब जब वह आती है मैके तब तब
नाती नातिन के जन्म उत्सव में ब्याह में
तीज में त्यौहार में
बहुत खर्च होता है हमलोगों में ..........
कामवाली कहती जा रही थी
और
मैं असहाय सी सोंच रही थी
अरे !
हम बड़े लोग तो
बेटी ब्याह गंगा नहा लेते हैं
कैसा हिस्सा
और
कैसा त्यौहार का उपहार
हम शहरी हैं
उत्सव की फुर्सत नहीं हमें |

जीने के लिये कितनी मैनेजमेंट


16 December 2014
09:18
-इंदु बाला सिंह

कितने उपवास करूं ?
कौन सा उपवास करूं !
अब रात में
आकस्मिक स्थिति में कैसे नहाऊं
आफिस भी जाना है न
आफिस की
कांच की छत ( ग्लास सीलिंग ) भी तोड़नी है प्रोमोशन के लिये
घर में काम है
बच्चे सम्हालना है
ओ रे वक्त !
कौन सा त्यौहार मनाऊं
अपने गांववाला
या
पड़ोसन के गांववाला
कितनी मैनेजमेंट करनी पड़ती मुझे
जीने के लिये
तू समझना क्यों नहीं चाहता वक्त |

मजा आने लगा खेल में


16 December 2014
07:17
-इंदु बाला सिंह

यारो !
कभी तुम नौ
कभी छ :
बड़ा मजा आने लगा अब मुझे
युद्ध कौशल में ........
इस खेल में |

कमरे कमरे बदला पानी


15 December 2014
22:31
-इंदु बाला सिंह

यारा !
तुम तो कहते
गांव गांव बदलता पानी
पर
हमने तो
कमरे कमरे बदलते देखा पानी
समय बदला
सो
ऋतू भी बदली
बचपन के साथी बदले
सहोदर बदले
पैसा बदला
कभी सफेद कभी काला 
कभी नाच नचाता इंसान को ता ता थैय्या
तो
कभी कुर्सी का सुख देता |

अनोखी समस्या


15 December 2014
13:15
-इंदु बाला सिंह


उसके  द्वारा खींचा
उसके  अपने पिता का चित्र
उनकी तेरही के बाद मन्दिर समेत उठा कर रख दिया था तुमने
अपने कमरे में
अब बंद हैं उसके पिता उसी कमरे में ........
सोंच रही है वह
उस ऐतिहासिक चित्र को हासिल कर ले 
या
अपने कम्प्यूटर में संजो कर रखे कापी का
वह एक प्रिंट आउट निकाल ले  
और
अपने कमरे में
वह  भी
तुम्हारी तरह एक अपना मन्दिर बना ले ........
कल रात वह आयी थी 
मेरे घर
अपनी समस्या का हल पूछने
पर
मुझसे कोई हल न पा
वह लौट गयी |