सोमवार, 17 नवंबर 2014

ऊंचा उठ


16 November 2014
14:37
-इंदु बाला सिंह

इतना ऊंचा उठ तू
कि
मुंह फेरनेवाले  भी
झुक जांय
नमस्कार हेतु
तुझे |

मौन


17 November 2014
21:18

-इंदु बाला सिंह

मौन
मुखरित न होना
सो जाना तुम
मेरे संग
भुजायें जब थक जायें
तब भी
चलते रहना
बस बहते रहना निरंतर तुम
निःशब्द |

रजनी गंधा


17 November 2014
20:40
-इंदु बाला सिंह

खाली पलों में 
एक एक कर खिलते हैं
रजनी गंधा सरीखे
यादों के फूल |

एक अद्भुत स्वप्न


17 November 2014
20:24
-इंदु बाला सिंह


आज भी याद आता है
कभीकभार
सासु माँ !
मुझे
वह रात का सपना 
जब तुम समाधि लगा ली थी
उस रात एक अनजान विशालकाय घर में
और
आंधी चल रही थी
बाहर
मैं एक एक कर 
ढेर सारी खिडकियां बंद कर रही थी
हड़बड़ी में भयभीत सी ..........
स्वप्न टूटा आधी रात को
और
उस स्वप्न के बारह घंटे बाद
तुम गुजर गयी थी
दूर राज्य के अपने घर में
यह कैसी टेलीपैथी थी
तुम्हारी
मेरे संग
या
यह महज एक संयोग था
पर जो भी था
वह स्वप्न अद्भुत था
मैं तो
नहीं जुड़ी थी तुमसे इतनी कभी
कि
तुम्हें याद करूं
ओ सासु माँ !
पर
शायद वह मानवता का रिश्ता था
जिससे
शायद मेरा मन जुड़ गया था तुमसे
पर
जिस रिश्ते ने सुना वह स्वप्न
आश्चर्यचकित हुआ था वह
एक पल को |

शनिवार, 15 नवंबर 2014

आत्मबोध


16 November 2014
10:34
-इंदु बाला सिंह

निष्क्रियता के पलों में भी
जग जाता है
कभी कभी
आत्मबोध
और
वह
रेंगता है .....
फुंफकारता है .....
दौड़ाता है .....
डंक मार बेसुध कर देता है
नियति को |

मुट्ठी में सूरज


15 November 2014
07:20
-इंदु बाला सिंह

हम बच्चे
अपने घर की आशा
और 
धरती के सूरज हैं
हम जब जागेंगे 
तब
होगा सबेरा 
ढंक लें
चाहे कितने बादल
हम
जब खोलेंगे मुट्ठी 
तब चमक जायेगी 
हमारी अंधियारी धरती
ऐसा है
विश्वास हमारा
हम हैं तो जहां है |

अज्ञानता में मस्ती


14 November 2014
22:41
-इंदु बाला सिंह

कहाँ से शरू हुयी थी
याद कर के होगा 
कहाँ होगी खतम
जानने की चाह नहीं
बस इसी उधेड़बुन में
चलते रहे
वे
कोसते रहे
अपने नसीब को ........
अज्ञानता में जीना भी
बड़ा
मस्त होता है
क्यों कि
रात में भूल जाता है
आदमी
कि
कल क्या पकेगा घर में |