बुधवार, 4 दिसंबर 2013

शोषण रुक जायेगा

मालिक और नौकर
मकान - मालिक और किरायेदार
गरीब और अमीर
कभी मित्र नहीं हो सकते
जिस दिन वे ये समझ जायेंगे

उस दिन उनका शोषण रुक जाएगा |

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

कमजोर नस है बेटी

बेटी पूरे गांव की होती थी
आज घर की ही नहीं
अब तो घर छोटा हो गया - मम्मी , डैडी और बच्चे
वो भी औलाद केवल एक चाहिए
पहली बेटी हो जाय तो दूसरी चाहिए
बेटा न हो तो वंश कैसे चलेगा ?
घर के रिश्ते खत्म हुए
मित्र अपने बने
रिश्तों को ही बेटी बोझ लगी
तो बेटी कैसे सुरक्षित हो आज !
केवल क़ानून और पुलिस करेगी सुरक्षा बेटी की ?
बड़े घर की छोटी सरल बेटियां
निर्भर नौकरों पर
धनी और गरीब की श्रेणी में बंटा समाज
धनी को कोसता सर्वहारा वर्ग
के लिए कमजोर नस है  धनी की बेटी
जो कि जब तब दबा दी जाती है
बेटी को हम कहाँ खो रहे हैं
आज बेटी स्वयं एक सर्वहारा वर्ग है
जिसे हम पूजते हैं  एक दिन
नवमी के दिन
और गर्भ में ही मार देते हैं बेटी को बाकी दिन
दोष माँ पर थोप देते हैं ......
कैसी माँ थी !
सुरक्षा न कर सकी अपनी बेटी की
ये कैसा पाठ पढ़ा रहे हैं हम अपने पुत्र को ?





शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

वक्त की पाबंदी स्कूल में

यूनिफार्म में स्कुल का बैग लटकाए
लौटनेवाले बच्चे
पैदा करते हैं मन में निराशा
जाड़े की सुबह
सरकारी स्कूल के प्रधानाध्यापक भी 
थोड़ा ज्यादा पाबन्द हो जाते हैं वक्त के
और सिखाने लगते हैं विद्यर्थियों को समय की महत्ता
अब ये बच्चे खलेंगे किसी पार्क में
या किसी खाली मैदान में
अपना बैग छुपा देंगे ये किसी पेड़ के पीछे
घंटों बतियाएंगे
और इधर उधर घूम कर लौट जायेंगे घर
ठीक विद्यालय की छुट्टी के समय पर
एक बार किसी ने देख लिया था
बच्चों को बालू के ढेर में बैग छुपाते
और छुप कर उसने बैग पहुंचा दिया था स्कूल में
बैग की डायरी देख
जम कर हंगामा हुआ था
समय पर स्कूल का गेट बंद कर
मीलों दूर से साईकिल चला कर स्कूल आने वाले बच्चों को
आखिर कौन सा पाठ पढ़ा रहा है स्कूल ?




लोक त्यौहार

लोक त्यौहार पल भर को भुला देतें हैं दुःख ....
त्यौहार आम  आदमी का सकून  है
भूल जाता है वह
विस्थापन
जीवन के दैनिक कष्ट
भविष्य के सपने
बस वह वर्तमान में जीने लगता है
बस इस वक्त  वह है  और उसकी जीवन दायिनी प्रकृति
कल की कल सोंचेगा वह |

नींव है लोक गीत

लोक गीत ईश्वर  का आह्वान हैं
तो शादी - ब्याह जन्मोत्सव का उल्लास भी है
यह मौन रुदन भी हैं
जो रिश्तों को आवाज लगता है
और सीधे प्रवेश करता है हृदय में हमारे
हम  कान बंद नहीं कर सकते
यह आवाज मधुर हो या करुण
घंटों भिंगोती  रहती है हमें  
मन खोजने  को आतुर हो  उठता है उस श्रोत को
ऐसा कोई नशा नहीं बना
 जो भुला दे  अपने घर की अपनी नींव को |

इज्जत पाती वो भी

पिता की मृत्यु के बाद
भाई को ' सर ' सम्बोधन मिलने लगा
सुख दुःख के कार्ड आने लगे
' सर ' के नाम
हर जगह ' सर ' सपरिवार  जाने लगे
बुलावा भी तो उन्ही के परिवार को  था
बहन को लोग भूल चले
अब वो लड़की थी
जो अपने पैतृक घर के एक कमरे में रहती थी
वह खुद कमाती थी
निर्भर न थी आर्थिक रूप से भाई पर
हर पल उसे भय था
किसी भी समय ' सर ' उससे घर खाली करवा सकते थे
सड़क पर उसे मनचलों का भय था
वह फब्तियों से भयभीत थी
बलात्कर से भयभीत थी
लड़की  थी न
कभी कभी सोंचती थी वो
ब्याह कर ली होती किसी के भाई से
या किसी के पिता से
तो शायद वो भी इज्जत पाती
सुरक्षित रहती |

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

भोर का भय

ब्याह कर आयी थी
सास का डर था
सबेरे सूर्योदय से पहले
सबके उठने से पहले सो कर उठना
और नहा धो कर रसोई में जाना रहता था
आज बहू का डर है
भोर भोर उठने में डर लगता है उसे
क्या भोर भोर उठ जाती हैं अम्मा
चैन से सोने भी नहीं देतीं |