शुक्रवार, 20 सितंबर 2024

पंडिता बनूँगी




#इन्दु_बाला_सिंह


अग्नि परीक्षा न दूँ


आँख पर पट्टी न बांधूँ


मैं तो बनूँगी 


पंडिता रमा बाई ……


शक्ति हूँ 


बदलूँगी निकटस्थों के भाग्य ।



सोमवार, 16 सितंबर 2024

सूर्य जगा

- इन्दु बाला सिंह 


सबने अलग अलग घर बसा लिया 


शून्य मूल्यहीन था 


वह भटकता रहा भूखा प्यासा 


एक दिन दौड़े आये उसके भाई बहन 


पहले एक पहुँचा 


बैठ गया शून्य के बाँये 


फिर एक एक कर के आते गये 


तीन , चार ,पाँच छः , सात , आठ , नौ बैठते गये शून्य के बाँये 


आश्चर्य चकित हुआ वह 


अब सब भाई बहन गोल गोल घूमने लगे शून्य के 


थोड़ी देर बाद शून्य खिलखिला दिया 


धूप निकल आयी 


सौर मंडल बन गया 


सूर्य खिलखिलाया ।




*    शिक्षक दिवस के अवसर पर ।

सत्य



दीवारें और तुलसी का चौरा गवाही न दे दें 


इस भय से 


टिकठी 


सम्मान पूर्वक उठी  


दीवार और तुलसी का चौरा देखते रह गये 


तेरह दिन की ही तो बात थी ……


 फिर दीवारें रंग दी गयीं 


अलमारी पर नया पेंट चढ़ गया 


तुलसी को दिन में 


ख़्याल से पानी दिया जाने लगा 


और 


रात को दीया  जलने लगा 


दिन में सूरज  किरणे सब कुछ देख रही थीं 


सब कुछ देख रहीं थीं चन्द्र किरणें भी 


हवाओं को खबर मिल रही थी 


प्रकृति समझ रही थी ……


कभी न कभी स्वार्थ की गगरी फूट ही जायेगी ।



गुरु दक्षिणा


-इन्दु बाला सिंह 


भोले बच्चे 

गुरु में  तुम्हें अपना शिष्य बनाने का मनोबल न हो 

तो 

न बनाना उसे अपना मानसिक गुरु 

वरना 

गुरुदक्षिणा में 

अंगूठा की माँग होगी  ।



लड़की और सुरक्षा

#part_2_poem

- इन्दु बाला सिंह 



उस लड़की के 


सारे रिश्ते 


ख़ुद को उसके संकटमोचक समझते थे .……

और 

उसके 


हित मित्र भी 


सुरक्षा देना चाहते थे उसे ……


उस उच्पदस्थ लड़की को समाज में 


इज्जत प्राप्त थी


ऑफिस के कर्मचारी 


उसके आदेश का इंतज़ार करते थे 


वह स्वयं सुरक्षा देना चाहती थी 


अपने निकटस्थों को 


अपनों को .…


वह 


एक फलदार वृक्ष बनना चाहती थी 


जिसमें 


दूरस्थ असहाय पंछी घोंसला बनायें……


बाड़े में रहना 


उसे पसंद न था  ।



घर में पुरुष



#इन्दु_बाला_सिंह


शरत बो ने आत्महत्या कर ली है 


खबर उड़ी 


और 


दब गयी 


शरत के चार बेटों में से एक का ही परिवार चला 


बाक़ी तीन अकेले रहे 


छोटा मोटा काम करते रहे 


माँ के प्यार को तरसते रहे 


और 


वे भी गुजर गये 


कैसा पिता या पति था होगा वह पुरुष 


मैं आज भी सोंचती हूँ ।



एलेक्सा

- इन्दु बाला सिंह 


उसने कहा 


धीरे बोलो पड़ोसी सुन लेगा 


मैं बोल पड़ी 


ऐलेक्सा से 

तुम बतियाते दिन भर 


वो नहीं सुन लेगी 


अपना नाम सुन 


एलेक्सा बोल पड़ी - 


 ‘ कैन यू से अगेन , आई डिडंट अंडरस्टैंड ‘ ।