मंगलवार, 19 जुलाई 2016

छुपती क्यों तुम



- इंदु बाला सिंह


ओ री कविता !
क्यों जन्म लेती हो तुम  सुबह के मॉर्निंग वाक के दौरान
और
घर पहुंच  ......... टिफिन तैयार कर टेबल के सामने बैठते ही
छुप जाती हो न जाने तुम कहां   । 

गिद्ध दृष्टि

 Indu Bala Singh


सड़कें
सज रहीं हैं
नये  लिबास धारण कर  रहीं हैं
छायादार हो रहीं हैं
पैदल और दुपहियावालों को सुकून दे रहीं हैं
बदरंग हो रहे हैं बगल के मकान ...... पर साँसे चल रहीं हैं इन घरों में   .......
चमचमाते मकानों की गिद्ध दृष्टि लगी है   ......  घरों पे ।

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

वह भूखा है



- इंदु बाला सिंह

प्रेम आसमानी  बादल है भूखे के लिये
भूख की बिलबिलाहट में उड़ जाते हैं कहीं दूर ये बादल और बरस जाते हैं तृप्त घरों में   .....
भूखे को तो बस  ....  काम चाहिये
स्वाभिमान  से भरी  रोटी चाहिये
भूखे का  दिवास्वप्न भी उसकी नौकरी है    ........
वह जानता है कि नौकरी ही   उसकी  पहचान है। 

अपना मकान


Indu Bala Singh




उनके अपने मकान ने 
बड़ा रुलाया उन्हें ...

वे भयभीत थे .... बुढ़ापे में कोई कब्जा न कर ले मकान ..... 
छूटे रिश्ते
बेटे से सहायता की आस लिये मिट गये वे
और
बेटे ...... एक दूसरे पे लगाते रहे ..... तोहमत.......
खाली हाथ आये थे वे ..... चले गये खाली हाथ ........
मकान बिक गया कौड़ियों के मोल
बेटे समझदार थे ....... 

उन्होंने अपने अपने हिस्से का पैसा रख दिया बैंक में ।

सोमवार, 11 जुलाई 2016

लड़की की जान

Indu Bala Singh


वह गिर रही थी
अपने देख रहे थे   ..... उसे
इंतजार कर  रहे थे ..... उसकी सांस के रुकने का
उसके   ..... कमरे के खाली होने का   ........
लड़की की जान बड़ी बेहया होती है   ....... शरीर त्याग नहीं करती है वह आसानी से । 

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

वह भूखी है



- इंदु बाला  सिंह

खा  के धोखे
सो  गई अंतरात्मा    .......  युवती  की  .....
अब   .... दिग्भ्रमित है वह .....
मिटाये न मिट  रही है उसकी भूख  .....
उसके सम्मान की सूखी रोटी
हर बार  झपट ले जाते हैं   ........ लार टपकाते कुत्तों के झुंड | 

कब तक रुकेगा मन



- इंदु बाला सिंह


बनीं इतनी दूरियां    ....... भला कैसे
कब तक रुकेगा   ...... मन आदमी का
बनने से लुटेरा     .......
आखिर क्यों है    ..... एक घर  भूखा
दूजे घर का डस्टबीन   ...... दिन भर के जूठन से भरा |