मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016

सूखी रोटियां



- इंदु बाला सिंह


हाय रे ! नौकरी
तूने याद दिला दी बचपन की सूखी रोटियां
मैं लाख भूलना चाहूं
पर
अकेले में मुझे सुस्ताते देख
चुपके से नजानें क्यों लुढ़कती हुयी आ जातीं हैं जेहन में
माँ के हाथ की सूखी रोटियां |

कहाँ से आये आतंकवादी


10 February 2016
07:36
-इंदु बाला सिंह


रात हो गयी है
शहर पुस्तकालय सा खामोश है
अस्पताल ऊंघ रहे हैं
थाना जाग रहा है
सड़कें ठंडी हैं .... पर घर गर्म हैं
बंद पुस्तकें सी मौन हैं
जिंदगियां ........
मेरा शहर सहमा सा है .....यह सदा चौकन्ना रहता है .........
मेरे शहर के बच्चे
शैतानियां नहीं करते
वे अभिभावक की छाँव से सीधे तीर से निकल
पहुंचते हैं अपने विद्यालय  ............
सुना है -
आतंकवादी हमारे शहर की ओर रुख किये हैं ..........
आज विचारमग्न है मन ....... आखिर किस ग्रह से आये हैं ये आतंकवादी |

रविवार, 7 फ़रवरी 2016

एक सोंच



-इंदु बाला सिंह


सती प्रथा  ठीक नहीं
विधवा विवाह  गलत नहीं
तो
कन्यादान क्यों सही    ...........
सोचूं मैं   । 

स्टील प्लांट बस रहा था



- इंदु बाला सिंह

याद है आज भी
दस वर्षीय
भयभीत सी अचम्भे से फ़ैली आँखों से दीखता दूर दूर तक का अँधियारा
जब उतरी थी
मैं रात के अंधियारे में
पिता के संग
राउरकेला के स्टेशन पर
और
रिक्शे में बैठ इस्पात एम्प्लॉयीज कॉलोनी को जाते हुये
सड़क  पर जलते बल्ब
दूर दूर तक फैला अँधियारा
और
पहाड़ बगल से गुजरना ..........
रोमांचित कर जाता है
भुलाये नहीं भूलता
काफी समय रिक्शा चलने के बाद
जगर मगर करती कालोनी भय मिटा दी थी   ...........
पिता को नौकरी लगी थी  ......... स्टील प्लांट बस  रहा था । 

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

सच पारदर्शी है



- इंदु बाला सिंह

सच पारदर्शी होता है
तभी तो
बिना सबूत के भी हम जान पाते हैं
धोबी  के उच्च जीवन  स्तर
और
शिक्षक के निम्न जीवन स्तर .......  मानहानि   ...... की कहानी  । 

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

कम नंबर का राज



- इंदु बाला सिंह

टीचर !
जब मुझे एग्जाम का  कोश्चन पेपर मिलता है
तो मुझे याद आती है मेरी मम्मी
और मैं डर  जाती हूं ........
मुझे याद आने लगती है
कम नंबर मिलने पर मम्मी  से मिलनेवाली  डांट  .....
और
गणित टीचर को समझ में आ गया
अपनी छात्रा के अंसर पेपर में मिलनेवाले कम नंबर का राज । 

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

गजब का अभाव



- इंदु बाला सिंह

यूं  लगता है
ट्रेन में बैठे हैं हम
घटनायें  ...... हिचकोले दे रहीं हैं
कभी जोर से ...कभी धीरे
कहां जा रही है ट्रेन !  ..... समझ ही न आ रहा
लोग दिख रहे हैं   ...... खिड़की से
शहर से ही गुजर रही है जरूर
पर कौन से शहर से गुजर रहे हैं हम पता नहीं
गजब की अनुभूति है
जो चाहते हैं हम
वह हमें मिलता नहीं
और
जो मिलता है
उसे हम चाहते नहीं ।