My 3rd of 7 blogs, i.e. अनुभवों के पंछी, कहानियों का पेड़, ek chouthayee akash, बोलते चित्र, Beyond Clouds, Sansmaran, Indu's World.
कितना भी बराबरी कर ले पिता
अपने बेटे बेटी में
उनके बचपन में
पर
बेटी को विदा कर
अपने मकान से बेदखल कर देता है वह
अपनी बेटी को
बेटा ही उसका अपना है
बेटी नहीं
इसे पितृसत्ता न कहूं तो क्या कहूं
बताओ जरा ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें