भूख है
टैक्स है
मंहगाई है
मकान की कमी है
डिजिटल पेमेंट कौन ले और कौन दे
हाथ में सब्ज़ियो के पैसे चाहिए
डोसा के पैसे चाहिए
समोसे के पैसे चाहिए
चाय के पैसे चाहिए
पेट्रोल के पैसे चाहिए
घर खर्च चलाना है
दवा के पैसे चाहिए
रिश्ते तो भूल गए
मां बाप को भी भूलने लगे हैं
पत्नी तो दूसरे घर की है
पति तो दूसरे घर का है
अपने बच्चों के लिए जद्दोजहद कर रहे हम
सभ्यता की ओर अग्रसर हो रहे हम
जी रहे हैं हम
रीढ़ मजबूत है
लड़ रहे समय से हम
कमा रहे हैं
पैसे ला रहे हैं
पैसों से घर है
पैसों को धूल समझना साहित्य ने सिखाया है
पैसों से ही हम हैं
हमारी नस्लें हैं ।
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