#इन्दु_बाला_सिंह
फ्लैट के किचेन के पारदर्शी दरवाजे से दिखते सिंदूरी आकाश ने
स्फूर्त कर दिया मन
याद आया अपना घर
अपनी छत
और
पूरा क्षितिज सिंदूरी था
कितना कुछ खोये थे हम …
खीझ आयी
इतनी जबरदस्त याद होती बचपन में
कॉलेज के दिनों में
तो
सरकारी कर्मचारी होते हम…
आकाश धीरे धीरे पीला हो रहा था …
मेट्रो भी तो पकड़ना है
ऑफ़िस पहुंचना है
मन को सुला दिया फुसला के
यादें भी सो गयीं ।
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