रविवार, 29 दिसंबर 2024

मूल्यहीन है मातृसत्ता

 


#इन्दु_बाला_सिंह


कोई गिलवा शिकायत नहीं 


पितृ सत्ता की संवाहक होती हैं 


घर छोड़ कर भागनेवाली लड़कियां 


आख़िर वे किसी पुरुष को 


ख़ुद से बेहतर समझीं ..ताक़तवर समझीं 


पुरुषों की दुनियाँ में वे ख़ुद को कमजोर समझीं 


उन्होंने भगाया नहीं किसी लड़के को 


आख़िर में उन्होंने समझाया 


आज भी मातृसत्ता 


मूल्यहीन है ।



गुरुवार, 26 दिसंबर 2024

गणित


 

#इन्दु_बाला_सिंह


गांव में 


बिस्तर पर पड़े दादा ने 


पास फटकने न दिया मुझे 


पुण्य कमाने का साधन थी उनके बेटे का मैं 


बिस्तर पर पड़े बी मौखिक गणित का जोड़ घटाव करवाते थे 


अपने पोते का 


मेरे ताऊ के बेटे को 


अपने वंशधारी को 


आक्रोश जो जन्मा तो जन्मा 


गणित न भाया कभी मुझे 


पर 


न जाने कैसे 


मेरी प्यारी बिटिया बनी 


अध्यापिका गणित की


सदा उत्सुक रही वह गणित में रिसर्च करने को  ।



सोमवार, 23 दिसंबर 2024

ईश्वर और जीवन



#इन्दु_बाला_सिंह


नया कर पाने चाह 


कुछ सीखने के चाह 


प्रेरणा है 


आगे बढ़ने की 


जीने की 


हर इच्छा पूर्ति 


गिर कर उठ पाने का सामर्थ्य 


जीवन  बनाता है सुंदर 


मुसीबत में पड़े इंसान की सहायता करने पर 


हममें ईश्वर का एक अंश आ जाता है 


मंदिर में क्यूँ खोजूँ 


सुख ,  शांति और ईश्वर 


वह तो मुझे दुआ में उठे हाथ के विकीरण में दिखे ।



और वह नेता बन गयी



#इन्दु_बाला_सिंह


उसने 


पिता खोया बचपन में 


वह जूझती रही समाज से 


अपनी माँ की ख़ुशी के लिये


अपनी बहन की ख़ुशी के लिये


मान सम्मान के लिये


उसे लगा जन प्रतिनिधि बन कर अपनों का हक़ पा लेगी


और 


वह नेता बन गयी ।



धूप ! कहाँ हो तुम



#इन्दु_बाला_सिंह


कमरे से बाहर निकलो तो धूप नहीं मिलती है 


मुफ्त का विटामिन डी कैसे मिले 


बदन गर्म कपड़ो से ढँका है 


सामने तार पर सूखते कपड़े धूप विहीन हैं 


केवल हवा उनकी मित्र है 


वह उनका गीलापन दूर कर रही है 


बाहर पार्क कोहरे में डूबा है 


सड़कों पर वाहनों के जलती रोशनी मात्र दिख रही है 


हार कर मैं निकल पड़ी 


धूप के तलाश में 


कहीं तो मिलेगी 


दिसंबर महीना सस्ती और तरह तरह की सब्जियां खिलाता है


पर 


छुपा लेता है धूप । 




17/12/24

भाँति भाँति के बंदी



#इन्दु_बाला_सिंह


परेशान थी मैं 


घर में 


पर 


सारे जहाँ की ख़बरों से वाक़िफ़ थी 


आजाद जीवन से परिचित थी 


ख़बरें जेल के राजनीतिक कैदियों की यातनाएँ बता रहीं थी 


जेल उन्हें भूख और पिटाई से  तोड़ रही थी 


वे अपमान और बीमारी से  बिलबिला रहे थे ……


मैंने सोंचा 


मैं आजाद तो थी कम से कम कुछ पलों के लिये 


मुझे चाँद तारे तो दिखते थे 


उनमें बैठे मेरे पूर्वज मुझसे बातें करते थे 


मेरे सपनों में आकर वे मुझसे मिलते थे 


लोगों की निगाहों में मैं भरे पूरे परिवार की सदस्य थी 


पर 


सत्य तो मैं जानती थी 


घर में 


मैं अकेली थी 


मेरे साथ मेरे पूर्वज थे 


और 


मेरा आसमान था ।



घर में सुंदर कमाऊ सेविका की चाह


 


 #इन्दु_बाला_सिंह


वे भी क्या दिन थे 


जब गोरे चिट्टे युवा को काली पत्नी मिलती थी 


आये दिन पति को वह चार बातें सुनाती थी 


घर में पत्नी का साम्राज्य रहता था 


और 


घर में रहता था पति नाम का एक प्यारा सा व्यक्तिव 


आज पार्क में खेलते लड़के 


आपस में गालियाँ बक रहे हैं 


घर में वे दे रहे हैं अपनी माँ बहन को गंदी गंदी गालियाँ …


आज युवाओं को 


अर्धांगिनी नहीं पत्नी के रूप में  सेविका चाहिये 


ऐसी सेविका जो बाहर से कमा कर लाए 


घर में बच्चों की देख भाल करे 


उन्हें संस्कारवान बनाये 


और 


अपने आफिस की समस्याओं का ठीकरा वे उस पर फोड़ सकें 


आत्महत्या करे तो जिम्मेवार अपनी पत्नी को बनाये 


उसकी औलादें अपने पिता से सीख रहीं हैं 


जीने का तरीका ।



मंगलवार, 10 दिसंबर 2024

लड़कियां फुटबॉल नहीं खेलतीं



#इन्दु_बाला_सिंह


दो साल के उम्र की लड़की 


पार्क में 


बालू में खेल रही है 


माँ 


अपने मोबाईल में व्यस्त है 


दो साल के बच्ची के खिलौनों में प्लास्टिक के किचेन के बर्तन हैं 


हर थोड़ी देर में बच्ची अपनी माँ को खेलने बुला रही है 


आये दिन दिखते हैं मुझे ऐसे दृश्य 


छोटे लड़के भी दिखते हैं 


वे फिसलन पर चढ़ते हैं 


झूला झूलते हैं 


रस्सी के जाल पर चढ़ने के चेष्टा करते हैं 


पाँच वर्ष के आसपास के होंगी तीन लड़कियॉं 


वे दौड़ रहीं हैं 


एक दूसरे को पकड़ने की चेष्टा कर रहीं हैं 


दो चार वर्षीय लड़कियां आयीं एक साथ 


मेरा मुँह देख कर हंस रहीं हैं 


अजूबा व्यवहार लगा मुझे 


वे फिर हंस रहीं हैं 


मेरी आँखे थोड़ी कड़ी हो गयीं 


क्या हुआ?


वे बोलीं -


हम लोग स्कूल में ऐसे ही करते हैं 


मैंने सोंचा -


लड़कियां फुटबॉल क्यों नहीं खेलतीं ।


#indubalasingh #hindipoetry

शनिवार, 7 दिसंबर 2024

भटकती शाम



#इन्दु_बाला_सिंह


मकान, कमरे, शहर सड़कें 


सासें लेते हैं संबंधों में 


संबंध तो गुजर गये 


पर याद रहे वे 


जहाँ हमने


जिया  था उन्हें 


उनकी मिठास को महसूसा था हमने 


बार बार पुकरते हैं वे शहर 

 


कमरों के दीवारों को एक बार छूने को जी करता है 


उन दीवारों में मेरे अपनों का स्पर्श मौजूद है 


मेरे संबंध अभी भी जीवित हैं 


मैं दरवाज़ों , खिड़कियों को स्पर्श कर 


अपनों की उपस्थति महसूस करना चाहती हूँ ……


वह मिट्टी के दीवार याद आती है 


जिसमें गाड़े थे नानी ने 


अपने सोने के सिक्के 


खोद कर निकाले थे उसने 


वे सिक्के 


मेरी माँ को दिये थे उसने 


बनवा लेना अपनी बेटी के लिये गहने 


उसकी शादी में काम आयेंगे 


बैंक, कोर्ट कचहरी क्या जाने औरत 


काश छू पाती मैं उन  दीवारों को 


कभी नानी, चाची , भाभी  , मामी ने छुआ था जिन्हें 


उम्र के अंतिम पड़ाव में


भटक रहा है बचपन ।



मंगलवार, 3 दिसंबर 2024

दुःख दिया ख़ुशी ने



#इन्दु_बाला_सिंह


सुख में खुश रही 


दुःख में भी खुश रहने का बहाना तलाशा मैंने 


और 


खुश रही 


खुश रहने की आदत ने जितना मुझे सुख दिया 


उससे ज़्यादा दुःख दिया 


जिन्हें मुझे रुलाने में आनंद आता था 


वे निकलते गये 


मेरी ज़िंदगी से 


अकेली हो गयी मैं 


संबंधों को जोड़ने की कोशिश में ।



चीता के दाँत



#इन्दु_बाला_सिंह


बिल्ली की तरह प्यारा चीता मुझे 


आज देखना है मुझे 


इसे 


प्यार से 


दूर से 


पास नहीं जाना है मुझे 


वरना 


यमराज के दरबार में पहुँच जाऊँगी 


काश मैं भरत होती 


बड़े आराम से चीता को सहलाती 


उसके दाँत गिनती ।



सोमवार, 2 दिसंबर 2024

दूर के रिश्ते



#इन्दु_बाला_सिंह


माँ, बाप हों या बेटे 


आँखों से ओझल हुये 


जो रिश्ते 


दुःखी न होना 


मिलने पर  उनसे 


किसी दिन आमने सामने 


लपक कर उनकी ख़ैरियत पूछना ।



बिछड़्न के ग़म



#इन्दु_बाला_सिंह


आओ बिटिया 


 जी  लें हम कुछ पल


संग संग


 इस भागम भाग जीवन के .…


ख़ुशियों के पल छप  जायेंगे 


हमारी मन की किताब में .…


अब की बिछड़े तो न जानें कब  मिलें 


लो बिछड़्न के ग़म 


 हम भूल चले ।



संबंधों की पुकार



#इन्दु_बाला_सिंह


आँखो में सपना है 


रिश्तों से महकते परिवार का 


ऐसा एक परिवार जो वर्ष में एक बार जुड़ जाये


अपनों के सुख दुःख से परिचित हो 


मिट्टी की महक  न छूटे 


अर्थ  और डिग्री को परे रख ख़ाली अपनत्व की नदी के किनारे बैठें हम 


प्रकृति की आर्द्रता महसूसें 


दिन भर चुहल करें 


हमारे बच्चे हमसे सहिष्णुता  सीखें 


पुरानिया के गुजरने का दुःख महासूसें 


नये के आगमन का आनंद मनायें 


जब तक चेतना है 


तब तक चेष्टा है … स्वप्न को सत्य करने का ।