-इंदु बाला सिंह
दिन में आंख लग गयी
न जाने कैसे बन्द मुट्ठी खुल गयी
और फिसल पड़े किस्मत के बीज ....
उस रात जोर की बरसात हुई
बीज .... मिले न वापस .....
खाली हाथों को मैं देखती रही ....
एक दिन भोर आंख खुली
पौधे लहलहा रहे हैं ... घर की चहारदीवारी में ...
ओह ! मेरी बन्द मुट्ठी के बीज पौधे बन गये ..
उन्हें हर शाम पानी देना जरूरी था
भोर भोर अखबार की टोपी पहनाना भी याद रखना था ...
किस्मत मुट्ठी से निकली न थी
वह पौधों में परिवर्तित हो गई थी ....
....…........
दूर बैठे बच्चे मां के एक वीडियो कॉल से सामने आ जाते थे ..
उच्चपदस्थ छात्रों की दुआ बरस रही थी ।
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