रविवार, 16 सितंबर 2018

पितृसत्ता की समर्थक

- इंदु बाला सिंह

पचासी साल की वह हमारी रिश्तेदार उम्रदार कभी न भायी मुझे ...

उसे लड़के पसन्द थे ..

उसने कभी लड़कियों की आजादी व हक के बारे में कुछ न कहा ..

उसका ब्रम्ह वाक्य था ...

' लड़की को कोई पिता मकान या खेत अपनी वसीयत में नहीं लिखता है '...

और पिता अपनी बेटी के नाम लिख भी दे खेत और मकान तो भाई और अड़ोस पड़ोस के लोग  उसे लेने नहीं देते हैं....

पिता के गुजर जाने पर लोग उसे अपने पैतृक घर से भगा देते हैं ...

और एक दिन तो उस बुढ़िया ने कमाल कर दिया..

पड़ोसन की बिटिया जब अपने मैके अपनी तीन वर्षीय बेटी  ले के आयी ...

वह कहने लगी ..
कितना प्यारा बेटा है इसका ।

जब मैंने कहा ..
 अरे बिटिया है उसकी !

मुझे मालूम था वह जान बूझ कर झूठ बोल रही  थी ...

पड़ोसन की बिटिया सड़क पर भी नंगी खेलती थी ....आखिर कितनी चड्ढी धोती उसकी मां ...

पल भर में वह कह उठी ...

क्या मैं उसका पैंट खोल के देखी हूं ।


वह पितृ सत्ता  की समर्थक थी ।

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