रविवार, 20 मई 2018

नसीबोंवाली


- इंदु बाला सिंह

शाम हो गई है

लोग अपने घर लौट रहे हैं

पर मैं लौट रही हूं अपना सिर छुपाने की जगह में ....

रात जितना गहरायेगी

उतना ही मधुर तान निकलेगा कण्ठ से

उस कहानीवाली चिड़िया की तरह ...


" मैं सबसे धनी .....मैं सबसे धनी ... "


आखिर मेरे सिर पर छत है ....

मैं नसीबोंवाली हूँ ।


शनिवार, 19 मई 2018

और मैं निकल पड़ी



Monday, April 02, 2018
6:17 AM


-इंदु बाला सिंह



भीड़ में रह कर भी भानेवाला अकेलापन

न जाने कैसे बदल गया

सूनेपन में .....

यह आंधी से पूर्व की निस्तब्धता थी

आंधी का सामना कर पाना भी तो मनोबल बढ़ाता है

और

मैं निकल पड़ी |

सोमवार, 30 अप्रैल 2018

भूख जरूरी है |



Tuesday, May 01, 2018
9:56 AM

-इंदु बाला सिंह


राजनीतिज्ञ सपने बेचता है

अबोध मन को होश आते ही नींद टूट जाती है

उम्र गुजर चुकी रहती है ..

जीवन की खुशी तो अबोधता में ही है ....

आधा पेट खा ... सो कुत्ते की नींद ..ओ स्वप्निल युवा |

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018

मन का भेड़िया



Saturday, April 21, 2018

8:26 AM

-इंदु बाला सिंह


 पारिवारिक पुरुष मित्र के मन का सोया भेड़िया एक दिन जाग गया .....

वह

भोर के अंधियारे में माता पिता के बगल में सोयी : मास की बच्ची  ले भागा  ....

शारीरिक सुख लेने के बाद अभागे दम्पत्ति की बेटी पटक दी गयी  ....

भला हो सी० सी० टी० वी० का जिसने पहचान करवा दी उस नर भेड़िये की .....

: माह की गुजर गयी बच्ची आज भोर की एक खबर भर थी ....

कल अन्य नव निर्माण की  खबरों के साथ दूसरे बलात्कार की खबर मिलेगी अखबार में ...

और फिर बिलबिला कर कलम चलेगी किसी लेखक की ..........

गुजरी बेटी का परिवार.... रोज रात  मर जाता है

जाने कैसे जी उठता है वह ... हर दिन ....हर भोर  ...

शायद उसे  अपने दूसरे बच्चों के पेट की भूख ने  जिन्दा रखा है |




रविवार, 15 अप्रैल 2018

अदम्य आकांक्षा



Monday, April 16, 2018

6:39 AM

हर हार के बाद फनफना उठता है मन 

क्रोधित हो दौड़ पड़ता है वह ....एक जीत के लिये ....

तुम मुझे ठग न सकती 

ओ क्रूर नियति !

तेरी हार का डूबता सूरज देखने की अदम्य आकांक्षा है ।

मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

धुंध की छांव



Tuesday, April 10, 2018
3:17 PM


-इंदु बाला सिंह


सूरज निकला

धुंध हटी

दूर दूर तक हृदय विदारक दृश्य था .....

धुंध में आस थी ....सपने थे ....

झुलसने लगा पौधा ....

घबरा कर मैंने बादल का आह्वान किया 

धुंध भली होती है क्या ?

उठने लगा एक प्रश्न .... मन में |

मंगलवार, 3 अप्रैल 2018

मधुशाला


-इन्दु बाला सिंह


माना भेद मिटाये तेरी हाला
ओ री मधुशाला !
पर कितने घर तोड़े तूने ...... तू क्या जाने
ज्यों ज्यों रात गहराये
तू इठलाये ... मेरा जी जलाये ।