गुरुवार, 17 नवंबर 2016

कठिन होता है जीना


Thursday, November 17, 2016
7:36 PM

-इंदु बाला सिंह

बड़ा कठिन होता है गम पीना 
अभावों की अदृश्य लाठी संग अकेले चलना
हर निकटस्थ का मान रखना
और
आजीवन युवा रह ...... बाइज्जत जी लेना |

रविवार, 13 नवंबर 2016

नाखुशी की कीमत


- इंदु बाला सिंह


नाखुशी में
मैंने ....जब कर डाले ......बड़े बड़े काम
तब समझ में आयी मुझे ..... कीमत नाखुशी की
वर्ना
खुशी ने तो मुझे
नकारा ही बना डाला था

गुरुवार, 10 नवंबर 2016

पांच सौ और एक हजार के नोट


10 November 2016
15:53


- इंदु बाला सिंह


रात में खबर क्या आयी इंटरनेट में
कि नींद उड़ गयी बहुतों की .....
रात बारह बजे से पांच सौ और एक हजार के नोट बाजार में नहीं चलेंगे |
मैंने लम्बी सांस ली
हमारे घर में मात्र तीन सौ रूपये थे .....
सोंच में पड़ी ... आखिर कामवालियों , मजदूरों का क्या होगा !
घर में ही रखते हैं वे अपने रूपये ......
गृहणियों का क्या होगा .... वे अपने मर्दों से छुपा के रखतीं हैं रूपये
और भी तो लोग हैं ...फल के ठेलेवाले , सब्जी के ठेलेवाले , गुपचुप बेचनेवाले व इन सरीखे अनेकों फेरीवाले .....
आखिर सो गयी मैं
पर शहर खरीद रहा था सोना ....
सुबह पढ़ी अखबार में
क्या डकैती नहीं पड़ेगी ... सोना रखनेवालों के घर में
रंगा पड़ा था अखबार
पांच सौ रूपये धारी की दुखभरी कहानियों से .......
कहतें हैं काला धन निकालने के लिये हुआ है बंद नोट
दो दिन बाद नया नोट मिलेगा .......
पूरे देश को हिला दिया इस नसुड्धे पांच सौ और एक हजार के नोट ने |

शनिवार, 5 नवंबर 2016

पैसा शराब से ज्यादा जहरीला


Saturday, November 05, 2016
10:16 PM
  
- इंदु बाला सिंह 

सुन मेरी बात
ओ पैसा !
तेरा अभाव सरल बुद्धिमान को मुर्ख बनाता
देख सगे  का हश्र चतुर आदमी तुझे पाने को  सौ हथकंडे अपनाता |
ओ पैसा !
तू तो शराब से ज्यादा जहरीला .... नशीला
जेब में पहुंचते ही .... तू तो सारे रिश्ते भुलाता
तभी तो  .... अम्मा तुझे बैंक में रख निश्चिन्त सोती |
मै बावरी
सदा मौन खड़ी
देखती रहती

तेरी ....बदलती चाल |

गुरुवार, 15 सितंबर 2016

उठाई है मैंने कलम



- इंदु बाला सिंह


काट मेरे मन के कोमलतम तार
तू चाहे मैं उठा लूं आग
पर
शांतिप्रिय मन मेरा
होने न देगा पूरी तेरी आकांक्षा ........
कि
उठाई  है मैंने कलम
और
उंडेल दी है उसमें पूरे मन की श्याही । 

तेरी ' मधुशाला '


Thursday, 15 September 2016
1:25 PM
इन्दु बाला सिंह


ओ ' मधुशाला ' के कवि !
मेरी दुश्मन है मधूकलश और  मधुशाला ......
तेरी आत्मकथा ने ………मोह लिया मुझे

पर बाँध न सकी    …… मधुशाला ……  निज  सम्मोहन में   ……   न जाने क्यूँ …….

कितने घर उजाड़े  ……   रंग रंगीली  मधुशाला ने  
आकर्षित करती हारे मन को  …… हर मधुशाला   
ख़ुद चमकती  …..वह  …..मुस्काती  लूट  ……  नित   नए रईशों का बैंक बैलेंस
तूने तो लिखी  …..   'मधुशाला '  …..   बिन पिये
और
मुझे भी  भाने लगी

आज  …….बिन पिये   …….तेरी ' मधुशाला '  

बुधवार, 14 सितंबर 2016

जो झेल गया वो दमक गया


Thursday, 15 September 2016
11:40 AM

-इन्दु बाला सिंह

प्रलय की रात हो
या
मूसलाधार बरसात हो
जो झेल गया   नकारात्मक प्रचंड आग
वह
दमक गया कुंदन सा

आनेवाली पौध के लिए   उदाहरण बन गया