गुरुवार, 10 मार्च 2016

आखिर क्यूं उड़ाना चाहते हो तुम


11 March 2016
07:13


-इंदु बाला सिंह



फूंक से उड़ाने के तुम्हारी आदत ने
अंधी कर दी तुम्हारी आंखें
और
झुलसा दिया तुम्हारा मुंह .....
अब मुंह छुपाये घूमते   हो
आखिर क्यूं उड़ाना चाहते हो तुम सबको
अपनी फूंक से |


अतृप्ति


11 March 2016
07:40



-इंदु बाला सिंह




अपमान और अभाव के आक्रोश से भरा मन
जलता है रेगिस्तान सा ...........
हैरत होती है
आखिर क्यों नहीं बुझती है यह आग
यह कैसी अतृप्ति है जो राख नहीं बनती |

सोमवार, 7 मार्च 2016

कैसा मान महिला का



- इंदु बाला सिंह

ड्राइंग रूम और पार्टियों के मुद्दे होते महिला दिवस
फिर
अपने घर में सो जाती हैं ...... बिला  जाती हैं  आम औरतें   ...........
घर में
पिता को नहीं भाती समानता अपने बेटे से
अपनी ही  बेटी की
माता को  न  महसूसता दर्द अपनी बेटी का
तो कैसा महिला दिवस
और
कैसा  मान महिला का ........
अरे !
अपाहिज बना दिया है तुमने बेटी को आरक्षण दे के  .......
तुमने उसे महसूस कराया है  ........  विश्वास दिलाया है
कि
वह दुर्बल है .......
वर्ना
वह भी खूब समझती है दुर्बलता पुरुषों की
जो राज करता है
औरत  की दया ... करुणा के बल पे  ......
और
शोषण करता है
अपनी निकटस्थ कमजोर स्त्री संबंधी का । 

शुक्रवार, 4 मार्च 2016

इंद्रधनुषी रंग



-इंदु बाला सिंह


दे दो आजादी
बेटी  को उड़ने की
अपने ही आँगन में .... फिर देखो ..........
इंद्रधनुषी हो गया है आकाश और समंदर
वैसे
लोग कहते हैं ....... खुशी और मुस्कान एक छूत की बीमारी है । 

गुरुवार, 3 मार्च 2016

हमारे बच्चों के सपने



- इंदु बाला सिंह


कुछ करें  स्कूलों , कालेजों में हम ऐसा
प्रतिभावान छात्र पढ़ें .... विषय का ज्ञान अर्जन करें   ......
अरे !
दुनियादारी सीखने को तो धरा है सारा जीवन ...
आखिर क्यों अवरुद्ध करें हम नदी की धारा
और
मोड़ें
उसे
अपने खेतों की ओर   ......
प्रतिभा को फूलनें दें हम
देश शक्तिशाली बनता है नित नये अविष्कारों से   ....
क्यों न सपने देखें हमारे बच्चे  चांद  पर   बस्ती  बसाने की । 

बुधवार, 2 मार्च 2016

गजब की आग



- इंदु बाला सिंह



होती  कितनी कठिन है चढ़ायी
पठार   की
और
गजब की आग होती है मन में पहचानने की दुनिया को ......... नया कुछ कर गुजर जाने की । 

रविवार, 28 फ़रवरी 2016

गली का आवारा



-इंदु बाला  सिंह

सूंघ कर  ........  देख कर   .......  चोर पहचानूं
गली में घुसने न दूं कोई अजनबी
घरों की बची रोटी से पेट भरूं
रक्षक हूं गली का
फिर भी
कहलाऊं  मैं ....... आवारा ....... कुत्ता ।