17
October 2014
08:08
-इंदु बाला
सिंह
वह औरत
खड़ी थी
मर्दों की
भीड़ भरी बस
में
ग्यारह महीने
के पुत्र को
गोद में
थामें
और
सबके कानों
में बज रही थीं
एक
दुसरे की जोरदार गर्म आवाजें
जो महसूस करा
रही थीं
उस औरत को
कि
ये सब पुरुष
बम्बई में हुये
दंगे के कारण
भाग रहे हैं
अपने गांव
और
वह औरत
ट्रेन के रूट
बदल जाने के कारण
लखनऊ के बस
स्टैंड से टिकट कटा
बस में खड़ी थी
आगे यात्रा के
लिये ड्राइवर की सीट से
टेक लगा
और
उसका
पुरुष
रिश्तेदार
बस की भीड़ में
पीछे कहीं खो
गया था
गोद का बच्चा
चिपका था कंधे से
उसके
अभी
उसे अपने
गन्तव्य तक पहुँचने के लिये
छ: घंटे बाकी
थे
एक घंटे बस चल
चुकी थी
वह औरत
लस्त पस्त
थी
बारबार अपने
बच्चे को
चिपका रही थी
एक कंधे से
दुसरे कंधे पर
और
बच्चा कौतुहल
से
टुकुर टुकुर
देख रहा था
अपने आसपास के
नये चेहरों को
तभी
सामने की दो
यात्रियोंवाली सीट पर बैठा
तीसरा युवा
अपनी जगंह से
उठ के कहा
......
बैठ
जाईये
तब
जान में जान
आयी उस महिला के
और
उसने
महसूसा
उस सर्वहारा
युवा के मन में
उपजे ट्रैफिक
सेंस को
दोनों ही
मुसाफिर छठी इन्द्रीय से
जान लिये थे
एक दुसरे के
धर्म को
पर
वे जुड़े थे
एक दुसरे से
मानवता के धागे से
अपने अपने बस
स्टॉप पर
उतर गये
वे
और
भूल गये
एक दुसरे के
चेहरे |