रविवार, 19 अक्टूबर 2014

यह सड़क मेरी बनायी हुयी है


17 October 2014
21:18
-इंदु बाला सिंह

ट्रेन की खिड़की से
दूर रोशनी से जगमगाती सड़क दिखा कर
एक दिन
उसने मुझसे खुश हो के कहा था  ..........
वो देखो
वह सड़क मेरी बनायी हुयी है
और
सड़क
जब पास आयी
तब
कौतुक पूर्ण नेत्रों से देख के
सड़क को 
सोंचा था मैंने ........
ओह !
तो
इस सड़क को
बनानेवाला
मेरे बगल में बैठा है |


अधबनी सड़क पर उतरी रात


17 October 2014
20:58
-इंदु बाला सिंह

अधबनी
दिन में
ढलाई की हुयी सड़क
पर
रात उतर आयी है
शीतलता बिखेर रही है अपनी
सो रही है सड़क
बड़े बड़े बोल्डर लगा कर
ट्रैफिक रोकी गयी है
सन्नाटे में
बालू के ढेर पर
चढ़ कर
सो रहे है दो कुत्ते
मौन खड़ा है
मिक्सर
टैकर
और
टैंकर की
ड्राईवर सीट पर
में सोया है चौकीदार
सुरक्षा के लिये
अपनी अधबनी सड़क की
सुबह होगी
फिर
आ जायेंगे
गाड़ियों  में भर भर के
मजदूर .....
कितना मुश्किल होता है सड़क बनाना
तभी तो
गांवों में दिखती हैं
कच्ची सड़कें
जो बरसात में भर जाती हैं पानी से
कितना धीमा होता है
दूरस्थ बस्तियों तक
सड़क का पहूंचना  |

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

सड़क बन रही है


17 October 2014
11:39
-इंदु बाला सिंह

मुट्ठी भर मर्द
सडक के किनारे निकली झाडियां साफ़ कर रहे हैं
और
दुबली पतली काली काली
अनगिनत लडकियां , औरतें
जरीदार साड़ियों में
जरीदार कमीज के संग जींस में
जूझी हैं
तीनों ऊंचे ऊंचे
सीमेंट , बालू और गिट्टियों के
ढेर से
उठा रहीं हैं बेलचों से
वे
बड़े तसलों में 
बालू
सीमेंट
गिट्टी
अपने सिर पे
और झोंक रहीं हैं मिक्सर में
मिक्सर से निकला मसला
डाल रहीं सड़क पे
पर
मिक्सर को चलनेवाला मर्द
डाल रहा है बगल में रखे ड्रम से पानी
कितनी
खुबसूरत
मजबूत सी सड़क बन रही है
जिस पर दौड़ेंगी
फर्राटे से
खुबसूरत कारें
कौन कहता है
मार दी जाती हैं
लडकियां
लडकियां हैं
तभी तो
बनती है सड़कें
पैदा होती हैं
रेजागण |






गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

ट्रैफिक का धर्म


17 October 2014
08:08
-इंदु बाला सिंह


वह औरत
खड़ी थी
मर्दों की
भीड़ भरी बस में
ग्यारह महीने के पुत्र को
गोद में थामें
और
सबके कानों में बज रही थीं  
एक दुसरे की जोरदार गर्म आवाजें
जो महसूस करा रही थीं
उस औरत को
कि
ये सब पुरुष बम्बई में हुये
दंगे के कारण
भाग रहे हैं अपने गांव
और
वह औरत
ट्रेन के रूट बदल जाने के कारण
लखनऊ के बस स्टैंड से टिकट कटा
बस में खड़ी थी
आगे यात्रा के लिये ड्राइवर की सीट से
टेक लगा
और
उसका
पुरुष रिश्तेदार
बस की भीड़ में
पीछे कहीं खो गया था
गोद का बच्चा चिपका था कंधे से
उसके
अभी
उसे अपने गन्तव्य तक पहुँचने के लिये
छ: घंटे बाकी थे
एक घंटे बस चल चुकी थी
वह औरत
लस्त पस्त थी 
बारबार अपने बच्चे को
चिपका रही थी
एक कंधे से दुसरे कंधे पर
और
बच्चा कौतुहल से
टुकुर टुकुर देख रहा था
अपने आसपास के नये चेहरों को
तभी
सामने की दो यात्रियोंवाली सीट पर बैठा
तीसरा युवा अपनी जगंह से
उठ के कहा ......
बैठ जाईये 
तब
जान में जान आयी उस महिला के
और
उसने महसूसा 
उस सर्वहारा युवा के मन में
उपजे ट्रैफिक सेंस को
दोनों ही मुसाफिर छठी इन्द्रीय से
जान लिये थे
एक दुसरे के धर्म को
पर
वे जुड़े थे
एक दुसरे से मानवता के धागे से 
अपने अपने बस स्टॉप पर
उतर गये
वे
और
भूल गये
एक दुसरे के चेहरे |

बेटी को सैल्यूट


17 October 2014
07:29
-इंदु बाला सिंह

पिता
जिस दिन सैल्यूट करता है
बेटी के श्रम ,कौशल व प्रतिभा को
उस दिन
अंकुरित होता  है सत्य
और
धीरे धीरे
बन जाता है
एक फलदार वृक्ष |

किंडरगार्टन


16 October 2014
11:46
-इंदु बाला सिंह

मम्मी
पापा
काये
तीन शब्द बोलनेवाला बच्चा
जाता है
किंडरगार्टन स्कूल
और
माँ मारती है गप्पें
कितने शान की बात होती
बच्चे को
स्कूल भेजना
आखिर अभिभावक भी तो बनते मित्र
भूल जाते हम
कि
कुछ न बोल पानेवाले
बच्चे को
जब
हम
स्कूल भेजते
या
कामवाली के संग छोड़ते
घर में अकेले
तब
क्या महसूस करता होगा बच्चा ....
ये कैसा भविष्य बना रहे हैं
हम
अपने बच्चों का
और
विद्यालय को दोष दे
अपना हाथ धो ले रहे हैं
बहती गंगा में
आज |


चित /पट


16 October 2014
09:04
-इंदु बाला सिंह

चित भी तेरी
पट भी तेरी
तंग कपड़े मत पहनो
रेप होगा
वेश्यावृति को कानूनी बनाओ
रेप रुकेगा
बेटे मत सुधारना
बेटी
ही
धुरी है
और
मुद्दा है
तेरी
ओ इंसान |