गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

दिन के बाद


 

 

रात आती है

 

विश्राम का सुख देने

 

यादें भी आ जातीं हैं चुपके से

 

रात गहराने लगती है

 

और दूर से सन्नाटे में सुनाई देती है

 

रेल की सीटी ... 

 

गड़गड़ाते हुये रेल डिब्बे भी गुजर जाती है

 

आंखों के सामने कौंध जातीं हैं उन की लाइटें ....

 

रेल ले जाती है मुझे

 

उन शहरों मे

 

जहां मैं बरसों पहले गई थी

 

धीरे धीरे दिमाग थकने लगता है ।

 

बुधवार, 3 दिसंबर 2025

बेटा जन्मा


 

 

विधुर

 

ठग कर पढ़ी लिखी लड़की से ब्याह किया

 

मैट्रिमोनियल के माध्यम से

 

पहले से दो बेटियां थीं पत्नी के उम्र की

 

संतान जन्मी

 

पुत्र जन्म की खुशीनाई उसने

 

कॉलेज पहुंच न सका

 

 बुरी संगत में पड़ गया लड़का

 

पिता से लड़ता था

 

नशा करता था

 

मां को मारता था

 

बोझ बन गया बेटा पिता पर

 

और एक दिन

 

पिता की आंखों के सामने गुजर गया

 

सोमवार, 24 नवंबर 2025

ब्याहता का दुःख


 

तीन बेटियों और दो बेटों की मां

 

मर्दिकम्मा

 

अपना दुःख बोलते बोलतेस कामवाली की आँखें भींज गईं

 

गांव में घर है खेत है भाई अनाज खाता है

 

मुझे नहीं देता.........

 

चेतना दुख देती है ।

बुधवार, 19 नवंबर 2025

आवाजें



रह जाती हैं आवाजें 

इंसान के गुजरने के बाद 

वे 

हमें आजीवन सुनाई देतीं हैं.....


जब जब हम अकेले होते हैं।

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2025

पुराने शहर का मोह


 

 

लौट के आई अपने पुराने शहर में

 

पुरानी सड़कों पर पुराने परिचित याद आते हैं

 

फर्राटे से वे स्कूटर पर गुजर जाते हैं

 

अस्पताल के कॉरिडोर में मां चलती दिखती है

 

कैबिन में सोए पिता दिखते हैं

 

कॉलेज यूनिफॉर्म में साइकिल चला कर लौटते आकृतियों में

 

मैं खुद को पाती हूं

 

मन करता है छोड़ दूं शहर

 

यूं लगता है

 

कब्र से जीवित हो उठे हैं लोग

 

 

 

 

रविवार, 5 अक्टूबर 2025

दुर्गा मंडप

 

 


 

 

पूरा मैदान बांसों अंटा था

 

मजदूर खोल रहे थे टेंट खोल रहे थे

 

जूठे पत्तल पड़े थे

 

सफाई कर्मचारी झाड़ू ले के लगे थे

 

सफाई में

 

सड़क पर दुर्गंध फैल रही थी

 

चलना मुश्किल था

 

और

 

मुझे

 

पूजा के समय की खुशी , रौनक , भीड़ और दर्शकों को अनुशासित करते

 

हाथ में लाल हरी बत्ती लिए

 

पुलिसगण याद आए

 

दुर्गा पूजा खत्म हो चुकी थी ।

शनिवार, 4 अक्टूबर 2025

घड़ा

घड़ा

 

घड़ा फूट गया सुबह सुबह ।

 

अब घड़ा खरीदना था

 

कभी घड़ा हनुमान वाटिका के पास मिलता था पर अब नहीं। किसी ने बताया छेंद वेजीटेबल मार्केट में मिलता है ।

 

वैसे मुझे पता है सुराही गमला ओल्ड राउरकेला के एक दुकान में मिलता है

 

दुर्गा पूजा चल रही थी । विजय दशमी बीती । चार दिन से एक घड़े से काम चल रहा था । दो घड़ा रहाे से लगातार ठंडा पानी मिलता है ।

 

खुशियां के दशमी के दो दिन बीतेन पर निकली घड़े के दुकान की खोज करने ।

 

घड़े की दुकान बंद थी । पास के गन्ने के रस के ठेलेवाला ने बताया कि दुकान दो दिन बाद खुलेगी ।

 

अब बहंगी में पास के गांववाले तो बेचना बहुत साल हुए घर घर जा कर बेचना बंद कर दिए ।

 

हार कर मैं ओल्ड राउरकेला की ओर बढ़ी । वहां बरसों से एक दुकान है जहां मिट्टी के छठे बड़े गुल्लक , सुराही , गमले और घड़े बिकते मैने देखा था । अब घड़ा साल भर बिकता है कि नहीं पता नहीं।

 

घड़ा खरीदने की जरूरत का जुनून थाआखिर ठंडा पानी पीन था मुझे । फ्रिज का पानी थोड़कोई पीता है ।

 

पहुंच ही गई गमले की दुकान परवहां एक घड़ा मुझे दिख गया

 

दाम पूछने  पर दुकानदार ने एक सौ पचास बताया

 

मैने पूछा - घड़ा फूटा तो नहीं है न ।

 

नहीं आंटी। फूटा नहीं है ।- दुकानदार ने कहा

 

इसी बीच किसी दूसरे सज्जन को भी घड़ की जरूरत पड़ गई

 

उसने भी घड़ का दाम पूछापर उसे घड़ का दाम ज्यादा लगा

 

उस सज्जन को लगा कि एक ही घड़ है । दुकानदार ने समझाया मेरी दुकान की डबलछत्ती मे घड़ा भरा है । फिर भी ग्राहक चला गया

 

मैं तो घड़ा के मिलने पर इतनी प्रसन्न थी मानो मुझे कारु का खजाना मिल गया