रात आती है
विश्राम का सुख देने
यादें भी आ जातीं हैं चुपके से
रात गहराने लगती है
और दूर से सन्नाटे में सुनाई देती है
रेल की सीटी ...
गड़गड़ाते हुये रेल डिब्बे भी गुजर जाती है
आंखों के सामने कौंध जातीं हैं उन की लाइटें ....
रेल ले जाती है मुझे
उन शहरों में
जहां मैं बरसों पहले गई थी
धीरे धीरे दिमाग थकने लगता है ।
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