गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

दिन के बाद


 

 

रात आती है

 

विश्राम का सुख देने

 

यादें भी आ जातीं हैं चुपके से

 

रात गहराने लगती है

 

और दूर से सन्नाटे में सुनाई देती है

 

रेल की सीटी ... 

 

गड़गड़ाते हुये रेल डिब्बे भी गुजर जाती है

 

आंखों के सामने कौंध जातीं हैं उन की लाइटें ....

 

रेल ले जाती है मुझे

 

उन शहरों मे

 

जहां मैं बरसों पहले गई थी

 

धीरे धीरे दिमाग थकने लगता है ।

 

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