बुधवार, 15 जुलाई 2020

खाना चाहिये


07:55
21/06/20
-इन्दु बाला सिंह
खाना चाहिये मुझे
देह दूरी मेरे काम की नहीं
कोरोना से न लागे डर............
पेट की आग
और
बच्चों की आशा भरी भूखी निगाहें डराती हैं मुझे........
गेट का कालिंग बेल बजा के अपने बच्चे के लिये खाना माँगा
मिली गालियाँ
साली सब आ जाती हैं ...माँगने ....बच्चे के लिये खाना... पैदा करते समय नहीं सोंचा था कि कौन खिलायेगा खाना.... कोरोना ढोती फिरती हैं कमीनियाँ
मुझे तो खाना चाहिये
अपने अपने बच्चों के लिये
ऐसे ही कितने मकानों के बनते समय मैंने ही तो बेलचा से बालू में सीमेंट मिलाया था ....मसाले की कढ़ायी अपने सिर पर धोया था और मेरे यही बच्चे बालू की ढेरी पर खेलते रहते थे .......
दिमाग सुन्न है
कोई नहीं सुनता किससे कहुं ?
मेरा मर्द तो भगोड़ा निकला ।

गल्तियां


10:28 AM
22/06/20
-इन्दु बाला सिंह
अपनी गल्तियों और सुधार में आई समस्याओं का पुलिंदा रख दिया था
एक दिन मैंने
अपनी बिटिया के स्टडी टेबल पर
इस विश्वास के साथ
कि
वह मेरी ग़लतियाँ नहीं दुहरायेगी
अपने जीवन की पाठशाला में
और
नयी ग़लतियाँ करती हुई .... नया कुछ सीखती हुई आगे बढ़ेगी
मुझसे ज़्यादा ऊँचाइयाँ छुयेगी.....
सुख भोगेगी.....
पर
अब इन्तज़ार भी है
कि
वह भड़कती हुई आयेगी .... तुम भी न मुझे बच्चा समझती हो !!
पर
दूसरे दिन मुझे उसका फ़ोन मिला ....
पढ़ लिया है मैंने माँ
तुम्हारा ढेर सारे पन्नोंवाला ख़त
और मैंने गोदरेज के लाकर में सम्हाल के रख दिया है उसे ......
इससे बड़ी वसीयत मेरे लिये कोई नहीं
लव यू माँ ।

रंगबिरंगा शहर


27/06/20
04:45
-इन्दु बाला सिंह
तेरी दुनिया
तुझी को मुबारक
मुझे न भाये तेरी बस्ती......
तेरी दुनिया
सरल को ठगे
सीमारेखा की लांघ में आनंद पाये.....
मैं
छोटे शहर की
मेरी आकांक्षाएँ छोटी ,सुख- दुःख छोटे ......
मैं
खुश हूं ..... संतुष्ट हूँ
रोज़ के भागम भाग से मुक्त हूँ ।

बेटियों से एक सवाल !


12:42 pm
02/07/20
-इन्दु बाला सिंह
राजाओं को उपहार में दास और दासियाँ दी जाती थीं
मानों दास , दासियाँ खूबसूरत वस्तुएँ हों
गजब काल था वह........
आज गरीब की बेटियाँ बेची जाती हैं
भले घर में पिता -माता द्वारा बेटियाँ दान की जाती हैं
आज भी बेटियाँ सामान हैं ........
बेटियों में जागरण क्यों नहीं ?
बेटियों से एक सवाल है -
“ क्या वे सामान बने रह कर खुश हैं ? “

औरत


10:46
06/07/20
-इन्दु बाला सिंह
समझदार ... औरतों से उनकी उम्र नहीं पूछते
मैंने आइना देखना .... वर्षों पहले छोड़ दिया था
मैं आजीवन कर्मठ रह पायी ।

होने का मोह


06:54
11/07/20
-इन्दु बाला सिंह
मैं न रहुंगी
तो
जग कैसा होगा
मेरे अपने कैसे रहेंगे ......
मुझे
मेरे पिता याद आये ।

काम चाहिये


09:00 AM
15/07/20
-इन्दु बाला सिंह
आज फिर रेल के प्लेटफ़ार्म पर खड़ा हूं
मैं सपरिवार......
दो माह पहले लौटा था अपने घर
कभी न लौटने के लिये तेरे देश.....
मोह भंग हुआ .....
पैतृक मकान खाना नहीं देता
दैनिक मज़दूर हूं
गाँव में यादें हैं
खाना नहीं
काम नहीं ।