शुक्रवार, 30 मार्च 2018

सत्तर साला औरत - 3


-इंदु बाला सिंह
वह दादी थी ..
वह नानी कहलाना भूल चुकी थी ...
न जाने क्यों ।

मैं पैसा हूं


- इंदु बाला सिंह
मैं पैसा हूं 
मेरी कोई जाति नहीं ...
मेरा कोई धर्म नहीं
मैं सबको जोड़ कर रखता हूं
मझे सब प्यार करते हैं
छोटे बच्चे किलक उठते हैं मुझे पा के
मैं उन्हें चॉकलेट और गुब्बारे दिलाता हूं
अमीर हो या गरीब सभी मेरी इज्जत करते हैं
मैं साधू सन्यासी के भी काम में आता हूं ।

लगा दे कोई एक कैमेरा


-इंदु बाला सिंह

मेरे शहर के कूड़ेदान पे ...
लगा दे कोई ..
एक कैमरा .....
न जाने कौन बिखेरता है कूड़ा दूर दूर तक
मेरी सड़क पे ।

उपहार हैं वें .... रिश्तेदार हैं वे |


Thursday, February 01, 2018
9:45 AM
-इंदु बाला सिंह

अपनों को माफ़ करते वक्त पत्थर बन जाता है कलेजा
और फिर रसधार नहीं फूटती
उस अपने के लिये ...
पर किसी न किसी मौसम में रसधार तो फूटेगी जरूर .....
आखिर अपने ही तो हैं वे .....
अपनों के उपहार हैं ....वे रिश्ते |

मन ही मनहूस हो गया है


Thursday, February 01, 2018
9:28 AM
-इंदु बाला सिंह
डूबता सूरज सा मन मनहूस होने लगता है
शायद मन ही मनहूस हो गया है .... न जाने क्यों !
वर्ना दिन भर के श्रम से शिथिल पड़ा बादलों की सेज पर विश्राम करता सूरज कभी दुखी न महसूस होता ..
सूरज तो सुख निद्रा में डूबा है
उसे सुबह उठना है
उसके कंधों पर जिम्मेवारी है |

बच्चा बनना भला


-इंदु बाला सिंह

अपमानित मन टूटे न 
दुखी न होय
बुजुर्ग ....बस बच्चा बन जाय ....
छोटी छोटी खुशियां तलाशे ...
और वह .... खुश हो जाय
बच्चा बन मुस्काना भला लागे उसे ।

छाता जरूरी है


-इंदू बाला सिंह

मां छाता होती है 
बच्चे को धूप , बरसात से बचाती है ....
रात में लाठी का काम करती है ..
एकदिन छाते की सियन टूट गयी ....
मुझे उघड़े छाते के साथ आफिस जाना पड़ा ..
और मुझे कमी महसूस होने लगीे छाते की ......
मैं सुई खोजने लगी ।