शनिवार, 6 अप्रैल 2013

बेटे का बाप



ठीक है
हम बना लेंगे
तेरे पसंद की लडकी को
अपनी बहू
पर उस लड़की को
अपने माँ बाप से सम्बन्ध
तोड़ना होगा
इस प्रकार गरीब पिता की बेटी
अपने प्रेमी के घर में
अपनी ससुराल में बस गयी
और बेटी का पिता
अपमान और दिल के दौरे से
दुनिया छोड़ गया
भला  उसने बेटी को
क्यों इतना टूट कर मान दिया था ?

सुन पुरुष


कितना अहम है
ऐ पुरुष तुझमें
महिला के विचार सदा नगण्य होते हैं
सदा अनुगामी के रूप में ही रखने की
तेरी  आकांक्षा
चाहे कुछ भी हो उसका तुझसे  रिश्ता
भाता है सदा तुझे 
अरे जाओ जब माँ का मन न पढ़ सके
तो क्या पढ़े तुम
सदा अकेले रहोगे तुम
अपने ही घर में अपनत्व से दूर
रावन का बल टूटा
तो क्या तूम उससे शक्तिशाली हो
टूट जाओगे
अब भी समय है सम्हलो
क्यों कि हर घर में हक के लिए युद्धरत है
सेनानी |

छोटी कविताएँ - 20


  भूख 

भूख ही पहचान है
जीवन की
भूख है
तो सब कुछ है
संसार है
भूख को सदा जीवित रखना
आधा पेट ही खाना
सुन रे ! इंसान |



   अद्भुत लड़की


रात भर मेघ गरजे
सुबह होते ही
लिपस्टिक लगा
कड़क माड़वाली सूती साड़ी में
वह निकली
ठेंगा दिखा समय को
देखते रह गये पड़ोसी |

छोटी कविताएँ - 19



मुक्त कर दो 

उड़ा दो
आज पिंजरे के पंछी को
तुझसे मोह रहेगा तो
आयेगा हर सुबह
तेरे छत पर
मुक्ति के गीत गायेगा  |




लुप्तप्राय सम्बन्ध 


लुप्तप्राय हो गये
रिश्ते उनके
जो बदल पाए
खुद को
समय के साथ |

छोटी कवितायेँ - 18


  छत विहीन 

मौसम की मार
जंगल में
अकेलापन
कितना सुख देती है
अनुभव देती है
आजीवन भुलाये नहीं भूलता | 


सड़क और लडकियां 

सड़क पहुंचाती है
गंतव्य तक
हमें |
सड़कों पर
जीने लगेंगीं  हम
कभी न कभी |
विश्वास है
आयेगा वो दिन
हमारी आजादी का |

कल हों न हों हम


प्रतिदिन की तरह
भोर होते ही
उसने कस कर खींची नकेल
शब्दों की
पीछे बैठा अपनी औलाद उड़ी
वो घुड़सवार
अगर जीती
तो शाम को लौटेगी सकुशल
घर में
पीछे बैठी उसकी संतान
सीख रही है
अभी से जिन्दगी के दांव पेंच
उत्सुक कौतूहलपूर्ण बाल आँखों में
एक सुरक्षा व विश्वास की ज्योति टिमटिमाती रहती है
वक्त बदला
सम्बन्ध बदले
पर न बदला मातृत्व |

वायवीय जड़े


  

चोटी पर पहुंचने का उन्माद
हममें कभी कभी
इतना असहिष्णु हो जाता है
कि हम अपनी सारी उर्जा झोंक देते हैं
चढ़ाई में
शिखर पर पहुंच ही जाते हैं
और तब हम पाते हैं
असीम आनंद
कुछ ही समय बाद लगने लगता है
अरे ! हमारी जमीन की जड़ें  कट गयी है
चोटी पर हमारे पैर जरुर हैं पर
हमारी हर गाँठ से
वायवीय जड़ निकल रही हैं |