मंगलवार, 13 मार्च 2012

आरक्षण

पुरुष
का हर रूप स्वार्थी ।
स्त्री 
का हर रूप है सुविधा भोगी ।
अपने को सही साबित 
करने के है बहाने  सकड़ों ।
दोनों में कंधे से कंधा भिड़ा  दौड़ने की 
इच्छाशक्ति ही नहीं ।
कैसे हो उत्थान ?
खाली आरक्षण चाहिए 
किसी न किसी  रूप में ,हर किसी को ।

नव युग


१९९०.
नव युग के निर्माता !
झंकृत किया है तुमने
स्थिर तारों को |
फूँका है तुमने
नव चेतना
मौन शंख में |
उद्वेलित मन
कुछ करने को आतुर
तू सोंच |
निविड़ रात्रि में
मन दीप जला
निकल मेरे मन |
क्या भय 
अकेलेपन का
है साथ तेरे सत्य |
तेरा सत्साहस
ले जायेगा खींच
अनेक कदमों को तुम्हारे पीछे |
हजारों कदमों की
एक सी आहट
देगी तुझे उत्साह सतत चलने का |

३०.०४.०१.


मातृत्व


पुराने पन्ने पलटते पलटते
याद आता है
तुम दोनों का बचपन |
इतिहास के वक्षस्थल में
जाता है दीख
संग्रामस्थल का विशाल मैदान |
दिखता है
प्रतारणा से
डरे सहमे दो चहरे |
कुछ पल बाद दीख जाता है
मेरी हथेलियों के नीचे
निश्चिन्त सोता बालपन |
और
मेरी उंगलियां थाम
चलते दो प्रफुल्ल बाल चहरे |
ये दृश्य
बोलने लगते हैं
मातृत्व का अस्तित्व |

सोमवार, 12 मार्च 2012

घड़ी की सूईयां



भविष्य की ओर
नहीं उठते पांव जब
वर्तमान बन जाता है अतीत तब |
स्वयं मन बन भविष्य
देखने लगता है वर्तमान को
और जीवन बन जाता है तालाब |
बस यों ही
चलती रहती हैं
घड़ी की सुईयां |
मन का झूठा आश्वासन
जीवन को धीरे धीरे लपेटने लगता है
धागे सा |
हे मानव !
क्यूँ नहीं हो जाता
मन पर सवार
और लेता थाम उसकी लगाम ?

रविवार, 11 मार्च 2012

विरासत

विरासत में मिला पुत्र को हक और सम्मान
और पुत्री को अस्तित्व युद्ध की मशाल
दोनों ही अचंभित  हैं |

शनिवार, 10 मार्च 2012

पिता


बालमन हर वृद्ध में
ढूंढता है पिता
पास जाने पर लगता है
अरे !  ये तो भ्रम था |

गुरुवार, 1 मार्च 2012

शून्य -तेरे कितने रूप

०६.०९.९७


शून्य तुम
कितने मोहक और शक्तिशाली हो !
बरसात के साथ आते हो
तो फसलें नष्ट कर देते हो |
अकेले जब चमकते हो दिन में
तब नवजीवन देते हो सजीवों को |
रात में जब झांकते हो खिडकी से
तब नहला जाते हो मानव को शीतलता से |
किसी संख्या की बायीं ओर खड़ा हो
उसका महत्त्व बढ़ा देते हो |
यह सौर -मंडल आज
जा रहा तुम्हारे गह्वर में |
यही सत्य है चिरंतन
तेरे आगे नतमस्तक है यह मस्तक |