सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

चौपाया


१९९७

    

अपनों में अपनापन
तलाशता मन
लहूलुहान होता तन
जाता है बैठ
घुसा पेट में कुहनी |
जठराग्नि से पा ऊष्मा
उठ खड़ा होता है स्व
निहारता हुआ हथेलियाँ
और हथेलियाँ बन जाती हैं पांव
दौड़ने लगता है एक चौपाया |

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