शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

संतोष


२०.०८ .०१.



     


प्रेम के घोंसले में
सुरक्षित थे तुम
पा स्नेह की ऊष्मा
तुम्हारा शरीर और पंख
बलिष्ट हुआ |
दूर दूर से चुगा
मैंने दाना उड़ उड़ कर
पंख क्षत- विक्षत हुए
पर था मुख पर
स्वाभिमान की चमक |
उड़ने लायक होते ही
उड़ गए तुम
कभी लौटने को
मैं रह गई यहीं |
आत्मसंतोष का जलता है दिया
अब प्रतिदिन
और कटता है
मोह का अँधेरा |


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