सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

पंछी पिंजरे का !


०९.०३.२०००

   

भीतर का कोलाहल बढ़ने पर
अकेलापन भी
महसूस होने लगता है |
चेतना का पंछी
सिर पटक सलाखों पर
हो जाता है लहुलुहान |
घायल पंछी पिंजरा समेत
उड़ने लगता है
एक मनचाहे पेड़ पर चूहे की तलाश में |

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