शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

मील का पत्थर

       

मील का पत्थर  बना वृद्ध
देता है दिग्दर्शन |
जरुरत है
मात्र पढ पाने की समझ |

संतोष


२०.०८ .०१.



     


प्रेम के घोंसले में
सुरक्षित थे तुम
पा स्नेह की ऊष्मा
तुम्हारा शरीर और पंख
बलिष्ट हुआ |
दूर दूर से चुगा
मैंने दाना उड़ उड़ कर
पंख क्षत- विक्षत हुए
पर था मुख पर
स्वाभिमान की चमक |
उड़ने लायक होते ही
उड़ गए तुम
कभी लौटने को
मैं रह गई यहीं |
आत्मसंतोष का जलता है दिया
अब प्रतिदिन
और कटता है
मोह का अँधेरा |


बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

मस्त रहिये !


  

  

खाइए सोईये
मस्त रहिये जनाब !
अंगडाई लीजिए
चाय पीजिए जहाँपनाह !
पड़ोसी हैं हम
हमारी क्या बिसात !
शान हैं आप
हमारे समाज की |
आपकी चर्चा
शान है नुक्कड़ की |
आपसे हैं हम
हमसे है दुनिया !
आप खुश रहिये
हमें भी मौका दीजिए !

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

चौपाया


१९९७

    

अपनों में अपनापन
तलाशता मन
लहूलुहान होता तन
जाता है बैठ
घुसा पेट में कुहनी |
जठराग्नि से पा ऊष्मा
उठ खड़ा होता है स्व
निहारता हुआ हथेलियाँ
और हथेलियाँ बन जाती हैं पांव
दौड़ने लगता है एक चौपाया |

आत्म - सुख की चाह !


०१.०९.९७ .



आत्म -सुख की तलाश में
पल पल खंडित होता है अस्तित्व |
अमराई की छाँव में
स्व को टटोलने लगता है मन |
तोड़ समय के ऊँचे पहाड़ों को
निर्बाध बहना चाहता है |



पंछी पिंजरे का !


०९.०३.२०००

   

भीतर का कोलाहल बढ़ने पर
अकेलापन भी
महसूस होने लगता है |
चेतना का पंछी
सिर पटक सलाखों पर
हो जाता है लहुलुहान |
घायल पंछी पिंजरा समेत
उड़ने लगता है
एक मनचाहे पेड़ पर चूहे की तलाश में |

बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

एक माँ


बेटा
हर माह आता है
हाथ में आये
पैसों का हिसाब मांगता है |
उसकी आवाज
अपने मृत पति के पैसों का हिसाब
देते वक्त मरी सी हो जाती है | 
बचे पैसों को ले
बेटा चला जाता है
बैंक में रख दूँगा कह |
वह
बैंक का हिसाब समझ नहीं सकतीं
अंग्रेजी समझ नहीं सकती
किसी पर विश्वास नहीं करती |
उसके लिए
पुत्री दूसरे घर की है
उसके पुत्र की हितैषी कैसे हो सकती है |
बेटे के जाते ही
वो शेरनी हो जाती है
कमजोरों को धमकाती है |
उसका
शरीर जब साथ नहीं देता
बेटी की समस्या को कर नजरअंदाज
उसे ही गुहार लगाती है |
फिर वह
कोई अपना नहीं कह 
गुहार लगाती है
हे ईश्वर उठा ले इस दुनिया से |

घर का गणित


लड़कियां
घर की शान होती हैं
पहचान होती हैं
जान होती हैं |
उनके बिना
घर रेगिस्तान होता है
शमशान होता है |
वे
घर की आत्मा होती हैं
रंगों की फुहार होती हैं
भोर की मधुर तान होती हैं |
लड़के
समाज का जवाब होते हैं
माँ का उल्लास होते हैं
पिता की निश्चिन्तिता होते हैं |
उनके बिना
पिता समाज में थके हारे होते हैं
चिंतामग्न रहते हैं
ठन्डे रहते हैं |
वे
समाज का जवाब होते हैं
खिलखिलाहट होते हैं |
आकांक्षा  होते हैं
दोनों
घर की आवश्यकता हैं
परिपूर्णता हैं
मुग्धता हैं |
समाज
घर से है
उससे क्या मांगें
क्यूँ मागें |
घर
का गणित
हम खुद ही
क्यूँ न हल करें |


  

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

उसके कितने रूप ?

             


वो
घरों में
बर्तन मांजती है
सड़क के किनारे
कुदाल चलाती है
ऑफिस की
सफाई करती है |
उसके
श्रम से
घर का चूल्हा जलता है
पैसे से
भाई बहन
विद्यालय जाते हैं
प्रार्थना से
देवतागण प्रसन्न होते हैं |
वह
बोझ है
मध्यवर्ग में
तृप्ति है
सड़क -छाप मजनुओं की
बहस का मुद्दा है
 बैठकों का |