गुरुवार, 20 अगस्त 2015

चिन्तन ...मनन


21 August 2015
08:07

-इंदु बाला सिंह

आये हैं तो जायेंगे 
पर
हम गुलाम न बनेंगे .......
मुफ्त की चाय ....मुफ्त का भोजन ....गलत बात .... गलत बात .........
पर दोषारोपण .... गलत बात .....गलत बात ........
पठन ...चिन्तन ....मनन ........अच्छी बात ........अच्छी बात |

तुम ही तो इश्वर हो


20 August 2015
17:44


-इंदु बाला सिंह


ओ माँ !
तुम ही तो इश्वर हो .........
मुझे जन्माने का कष्ट
मैंने माँ बन कर जाना
और
तुम्हे लेबर रूम में तड़पते देख
मेरा पिता ने भी जरूर महसूसा था होगा ......
तुम ही तो शक्ति हो माँ |

गजब की नींव


20 August 2015
16:58


-इंदु बाला सिंह


शिकायत कर कर के
जब
चुप हो जाता है बच्चा
तब
वह शांत नहीं रहता है .......
वह जलने लगता है
प्रतिशोध की ज्वाला में ...........
क्यों नजरअंदाज करते हैं 
हम
अपने बच्चे की शिकायतें .......
गजब की नींव बना रहे हैं हम
अपने घर की |

रविवार, 16 अगस्त 2015

निम्न वर्ग का उत्थान


16 August 2015
22:58

-इंदु बाला सिंह


मंगनी का टी शर्ट और जींस पहन के
सड़क पे चहकती है ........दौड़ती है
स्कूटी नहीं है तो ........क्या गम है
मस्त है ...खुश है
कामवाली की अठरह वर्षीय बेटी ........
वह बन गयी है
मालिक की बिटिया सरीखी 
यह कैसी प्रगतिशीलता है !
कौन समझावे
उस कामवाली को ........
जो समझावे उसे
वही दुश्मन कहलावे ........
यह अजीब सा उत्थान हो रहा
निम्न वर्ग का |

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

मैं अपना भाग्य विधाता हूं


15 August 2015
00:51

-इंदु बाला सिंह

आजादी का जश्न मनाते वक्त
याद आये
मुझे
मेरे जन्मदाता
जिनके
त्यागपूर्ण जीवन के बल पे
सदा जलती रही
कुछ कर गुजरने की लौ
मेरे मन में .......
आज
इस सम्मानजनक समाज में
क्यूं न याद करूं मैं
अपना ...........आर्थिक अभाव ........
बदली मैंने अपनी किस्मत
अपने छोटे छोटे हाथों से ......
आज खोली जो मुट्ठी मैंने अपने अंधेरे कमरे में
तो
रोशन हो गया .......
मेरा कमरा .........मेरा जहाँ ........
मैं अपना भाग्य विधाता हूं |

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

काश ! मिलतीं पुस्तकें


13 August 2015
16:24


-इंदु बाला सिंह


घरों से
शनिवार को मिलता है
चावल या पैसे
किसी किसी त्यौहार में तो पुराने कपड़ों के गट्ठर
दिखते हैं सड़क पर .... अभावग्रस्त ........ परिवार से प्रताड़ित अपने
काश !
एक दिन ऐसा होता
जब
दान में मिलतीं
घरों से
पुस्तकें .....कहानियों की
और
दिखते सड़क पे ..........सपनों के भूखे |

मंगलवार, 11 अगस्त 2015

मन नहीं मरता


11 August 2015
13:40


-इंदु बाला सिंह


मन
इतिहास है
वह नहीं मरता ........
वह जीता है ......तृप्त होता है .........
अपनों की आकांक्षाओं में ......
मन 
कहानियां बन
मुखरित होता हैं
पुस्त दर पुस्त
किसी
खाली दुपहरिया
या
किसी शाम की बतकही में ...
आज भी गाते हैं
हम
कहानियां अपने पूर्वजों की |