शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

ठीक कर दो मेरी गुड़िया


14 August 2014
09:10


मेरी गुड़िया पड़ी बीमार
सौ से उपर डिग्री चार
कल था बरसा झम झम पानी
उसमें भींगी मेरी गुड़िया रानी ........
ओ भगवान !
सुनो तुम मेरी बात
आला लगा के देख लो मेरी गुड़िया
क्यूंकि
ये ही है
मेरी प्यारी साथिन
चंगी कर दो मेरी गुड़िया
चढ़ाऊँ मै
तुझे सवा रुपय्या |

ए० सी० है मेरी शान


14 August 2014
09:02
-इंदु बाला सिंह

मेरा बेटा बड़ा समझदार
लगाया ए० सी० मेरे कमरे में
शान बढ़ाई उसने
मेरी मुहल्ले में
अब
मुंह में मेरे
दांत नहीं तो क्या हुआ
मुझ बुढ़िया को
क्या अब भुट्टे खाना
गीत गाना नाच नाच के
घर में |


मेरा कम्प्यूटर


14 August 2014
08:23
मेरा अँधियारा मन
पढ़ लेता है मेरा कम्प्यूटर
जला देता बत्ती |

तारा बनी हमारी मछली


14 August 2014
08:02


घो घो रानी
बोल मेरी मछली कितना पानी ?
घुटने तक पानी ............
घो घो रानी
बोल मेरी मछली कितना पानी ?
कमर तक पानी ........
घो घो रानी
बोल मेरी मछली कितना पानी ?
कंधे तक पानी .......
घो घो रानी
बोल मेरी मछली कितना पानी ?
और
मछली चली गयी
तारा बनी
रात में
दिखाए राह हमें
जग में |

सुन समय


14 August 2014
07:30
-इंदु बाला सिंह

बरसात में
जीवन संध्या में
बालकनी बड़ी सुहानी लगती है
और
भींगी फुहारें
पहुंचा देती हैं
मन को
उन गलियों में
जहां जहां से वह गुजरा  था
निराश पलों में
आशा के घूंट पिला के
पाला था उसे
मैंने |
आज देखूं
मैं
अर्जुन सरीखी
अपना भूत अपने वक्षस्थल में |
ओ समय !
तू ही तो रहा
मित्र मेरा
सदा रहा साथ मेरे तू
रात हो या दिन
मैं न रहूं तो
खुश रखना तू
मेरे लगाये पौधों को |






खट्टे अपने


14 August 2014
06:59
-इंदु बाला सिंह

ओ सहोदर !
याद आते वे
बचपन के
झगड़े
जो मीठे लगते थे
कभी
पर अब न लगें
वे मीठे
क्यूंकि तुम अब भी झगड़ते हो
और
बीज गिर रहे हैं हमारे झगड़ों के
हमारे बच्चों के मन में |
अब
बेहतर है
हम न मिलें
अपने बच्चों की भलाई के लिये |
आशा करूं मैं
समय से
जो करेगा 
उस बीज को निष्क्रिय
जो आ गिरा था
उस आंधी में
उनके
बाल मन में
और
वे
आजीवन बंधुत्व रखें
अपने सहोदर से
मांगना न भूलें
परम शक्ति से दुआ
भले ही वे
सागर पार रहें  |

माँ की सहारा है बेटी


13 August 2014
20:43
-इंदु बाला सिंह

उसने ब्याह न किया था
अपने कुनबे में रहती थी वो
पर
अपनी माँ का खर्च उठाती थी
उसका भाई
अपने परिवार में व्यस्त था
और
अपनी माँ की ओर से निश्चिन्त था |
वह 
माँ के लिये
शहर में एक कमरा भाड़े में ले रखी थी
और
ख्याल रखती थी वह माँ का |
हर तीज त्यौहार में
वह कपड़े ले के आती थी
अपनी माँ के लिये
जिसने आजीवन घरों में काम कर के
पला था बच्चे
अपने पति की मौत के बाद
और
आज उसे सुख पहुंचा रही थी
उसकी बेटी
जो कि हिजड़ा थी |