कचड़े में खाना ढूंढती गाय
बेटे के घर के पिछले कमरे में गठरी बनी मां
गांव में छूटी पत्नी
इलेक्शन के समय याद आतीं हैं
वैसे हम रोज देवी के सामने धूप जलाते हैं
घंटी भी बजाते हैं
एन जी ओ भी सम्हालते हैं ।
My 3rd of 7 blogs, i.e. अनुभवों के पंछी, कहानियों का पेड़, ek chouthayee akash, बोलते चित्र, Beyond Clouds, Sansmaran, Indu's World.
कचड़े में खाना ढूंढती गाय
बेटे के घर के पिछले कमरे में गठरी बनी मां
गांव में छूटी पत्नी
इलेक्शन के समय याद आतीं हैं
वैसे हम रोज देवी के सामने धूप जलाते हैं
घंटी भी बजाते हैं
एन जी ओ भी सम्हालते हैं ।
एक पुश्त को आजादी न मिली
दूसरी को अभाव मिला
तीसरी को मात्र कमाना खाना मिला
तीनों पुश्त ने श्रम किया मजदूर की तरह
किसी पुश्त को वसीयत में मकान न मिला
लड़कियां थीं न ।
औरत बचा लेती है समय अपने लिये
रात उसकी अपनी होती है
कोई कोना तलाशती है वह
और
अकेली बैठती है
यह उसका अपना साम्राज्य है
जिसकी वह मालकिन है
यादें उतरतीं हैं उसके सामने
कभी वह उन्हें चित्रबद्ध करती है
तो कभी लेखनबद्ध
दिमाग खाली हो।जाता है
फिर बीज पड़ते हैं
निकली कोंपल को
बकरे के डर से
पिंजड़े में रख सो जाती है ।
रात आती है
विश्राम का सुख देने
यादें भी आ जातीं हैं चुपके से
रात गहराने लगती है
और दूर से सन्नाटे में सुनाई देती है
रेल की सीटी ...
गड़गड़ाते हुये रेल डिब्बे भी गुजर जाती है
आंखों के सामने कौंध जातीं हैं उन की लाइटें ....
रेल ले जाती है मुझे
उन शहरों में
जहां मैं बरसों पहले गई थी
धीरे धीरे दिमाग थकने लगता है ।
विधुर
ठग कर पढ़ी लिखी लड़की से ब्याह किया
मैट्रिमोनियल के माध्यम से
पहले से दो बेटियां थीं पत्नी के उम्र की
संतान जन्मी
पुत्र जन्म की खुशी मनाई उसने
कॉलेज पहुंच न सका
बुरी संगत में पड़ गया लड़का
पिता से लड़ता था
नशा करता था
मां को मारता था
बोझ बन गया बेटा पिता पर
और एक दिन
पिता की आंखों के सामने गुजर गया ।
तीन बेटियों और दो बेटों की मां
मर्द निकम्मा
अपना दुःख बोलते बोलते उस कामवाली की आँखें भींज गईं
गांव में घर है खेत है भाई अनाज खाता है
मुझे नहीं देता.........
चेतना दुख देती है ।