औरत बचा लेती है समय अपने लिये
रात उसकी अपनी होती है
कोई कोना तलाशती है वह
और
अकेली बैठती है
यह उसका अपना साम्राज्य है
जिसकी वह मालकिन है
यादें उतरतीं हैं उसके सामने
कभी वह उन्हें चित्रबद्ध करती है
तो कभी लेखनबद्ध
दिमाग खाली हो।जाता है
फिर बीज पड़ते हैं
निकली कोंपल को
बकरे के डर से
पिंजड़े में रख सो जाती है ।
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