मंगलवार, 9 दिसंबर 2025

औरत और बकरा


 

 

औरत बचा लेती है समय अपने लिये

 

रात उसकी अपनी होती है

 

कोई कोना तलाशती है वह

 

और

 

अकेली बैठती है

 

यह उसका अपना साम्राज्य है

 

जिसकी वह मालकिन है

 

यादें उतरतीं हैं उसके सामने

 

कभी वह उन्हें चित्रबद्ध करती है

 

तो कभी लेखनबद्ध

 

दिमाग खाली हो।जाता है

 

फिर बीज पड़ते है

 

निकली कोंपल को

 

करे के डर से

 

पिंजड़े में रख सो जाती है ।

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