#इन्दु_बाला_सिंह
बिल्ली की तरह प्यारा चीता मुझे
आज देखना है मुझे
इसे
प्यार से
दूर से
पास नहीं जाना है मुझे
वरना
यमराज के दरबार में पहुँच जाऊँगी
काश मैं भरत होती
बड़े आराम से चीता को सहलाती
उसके दाँत गिनती ।
My 3rd of 7 blogs, i.e. अनुभवों के पंछी, कहानियों का पेड़, ek chouthayee akash, बोलते चित्र, Beyond Clouds, Sansmaran, Indu's World.
#इन्दु_बाला_सिंह
बिल्ली की तरह प्यारा चीता मुझे
आज देखना है मुझे
इसे
प्यार से
दूर से
पास नहीं जाना है मुझे
वरना
यमराज के दरबार में पहुँच जाऊँगी
काश मैं भरत होती
बड़े आराम से चीता को सहलाती
उसके दाँत गिनती ।
#इन्दु_बाला_सिंह
आँखो में सपना है
रिश्तों से महकते परिवार का
ऐसा एक परिवार जो वर्ष में एक बार जुड़ जाये
अपनों के सुख दुःख से परिचित हो
मिट्टी की महक न छूटे
अर्थ और डिग्री को परे रख ख़ाली अपनत्व की नदी के किनारे बैठें हम
प्रकृति की आर्द्रता महसूसें
दिन भर चुहल करें
हमारे बच्चे हमसे सहिष्णुता सीखें
पुरानिया के गुजरने का दुःख महसूसें
नये के आगमन का आनंद मनायें
जब तक चेतना है
तब तक चेष्टा है … स्वप्न को सत्य करने का ।
#इन्दु_बाला_सिंह
माँ, बाप हों या बेटे
आँखों से ओझल हुये
जो रिश्ते
दुःखी न होना
मिलने पर उनसे
किसी दिन आमने सामने
लपक कर उनकी ख़ैरियत पूछना ।
#इन्दु_बाला_सिंह
आओ बिटिया
जी लें हम कुछ पल
संग संग
इस भागम भाग जीवन के .…
ख़ुशियों के पल छप जायेंगे
हमारी मन की किताब में .…
अब की बिछड़े तो न जानें कब मिलें
लो बिछड़्न के ग़म
हम भूल चले ।
#indubalasingh #hindipoetry
#इन्दु_बाला_सिंह
दूसरों की रोशनी देख कर खुश हैं हम
अपनी तो ऐसे ही दिवाली मनती है
द्वार पर जलाये हैं दो दिये
मैंने
मन का अंधियारा भी तो दूर करना है ।
27/10/24
#indubalasingh #hindipoetry
- इंदु बाला सिंह
दिखाने के लिये मां के पास बेटे और उसके मित्रों की भीड़ है
बिस्तर पर पड़ी मां को सही गलत का ज्ञान नहीं
वो जो मांगे उसे बेटे खिला देते हैं
और फिर मां तड़पने लगती है दर्द से .....
मां को अस्पताल ले जाना है सुनते ही घूमने निकल गया बेटा
अब अस्पताल का झंझट कौन उठाये ?
ऐसे बेटे को क्या नाम दूं !
मां की जान भी जबर है
खाली चीखती है ....
काश एक बार में ही मुक्त हो जाती मां अपने शरीर से !
पुत्र चिंतामुक्त हो जाते .....
अपना अपना हिस्सा ले लेते ....
सही कहा था मेरे पिता ने ....
बच्चा बूढ़ा एक नहीं
बच्चे का नखरा उठा सकते हैं लोग
पर बूढ़े का नहीं .....
मेरी स्कूल में पढ़नेवाली बिटिया कह उठी .....
ईश्वर क्या ऐसे बेटों को सजा नहीं देता है ?
मैं सोंच में पड़ गयी ......
मेरी बिटिया देख रही थी
पड़ोस की बूढ़ी दादी का कष्ट
और
मैं सोंच रही थी ......
ईश्वर हाथ पैर चलते उठा लेता मुझे तो अच्छा रहे
मुझे अपना ऐसा बुढ़ापा न भोगना पड़े |
- इंदु बाला सिंह
बच्चे
बड़े हुये
पाँखें निकलीं
और
वे उड़ चले
अपनी मनपसंद दुनियां की ओर .....
अब लौटेंगे वे
अपनी पैतृक सम्पत्ति लेने
आज मोह के धागे टूट गये .....
मात्र लगड़ी .... पंख हीन संतान फुदकती रही |