बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

गजब का लिंगभेद


- इंदु बाला सिंह

किसी उच्चपदस्थ पुरुष को देख वह सोंचती है

मेरा बेटा भी बनेगा इतना ही बड़ा ... इतना ही सफल ।

किसी उच्चपदस्थ महिला को देख

नहीं सोंच पाती वह ...

अपनी बेटी के उच्चपदस्थ होने के बारे में ।
................

गजब के लिंगभेद की जड़े हैं हमारे मन में ।

आवेश में


- इंदु बाला सिंह


मां को मार दिया उसने ...

न जाने क्यों ।

सजा हुयी उसे

मृत्यु पर्यन्त कारावास ...

लोग कहने लगे

अरे ! आवेश में आ कर मार दिया होगा ।
.......…………

यह कैसा आवेश था ?

मेरा घर कौन सा है ?

#स्त्री

- इंदु बाला सिंह


होश सम्हालते ही पाया मैंने खुद को अनाधिकृत जमीन पर

बेटी हूं न ....

बचपन में पिता का घर था

युवावस्था में पति का घर था

मेरा घर कौन सा है ?

स्वाभिमान

#स्त्री

-इंदु बाला सिंह


मैं नॉकरी से रिटायर हो गयी

अब ....दिनचर्या भर बदली है

और कुछ नहीं

व्यस्तता तलाश ली है मैने

अहसानमंद हूं मैं अपनी माता की जिसने मुझसे बचपन से ही चौके का काम करवाया

अहसानमंद हूं मैं अपने पिता की जिन्होंने रिश्तेदारों की परवाह न कर मुझे उच्च शिक्षा दिलवायी

आज मैं स्वाभिमानी बुजुर्ग हूं

ऑफिस छूटा तो क्या हुआ चौका तो सदा मेरा है

मैंने अपने घर में कालेज के विद्यार्थियों को पेइंग गेस्ट रख लिया है

मेरा कमाने का तरीका भर बदला है ।

यशस्वी भव ।


- इंदु बाला सिंह


कभी किसी अपने के डहुरने का कारण न बनना
 
बीता पल लौट के न आता

घाव कभी न भरता

रुपया कुछ है पर सब कुछ नहीं

भागमभाग में उतर जाता है नशा ....

आखों के आगे

बस

सूना आकाश रह जाता है ....

बंजर जमीन रह जाती है ...

यश न कमाया तो क्या कमाया ।

जी ले हर पल


- इंदु बाला सिंह


उठ

बाँध समय को

वरना निकल जायेगा पल हाथ से

आज तक

न लौटा है समय

और

न लौटेगा कभी......

जी ले

कहीं हाथ न छूट जाये अपनों का ....

इस भागमभाग में |

अब मेरे पास बहुत काम है




#स्त्री
- इन्दु बाला सिंह 

मैं कामवाली हूं

मेरे सफेद बाल थे

कोई मेरी ओर देखता ही न था

मुझे काम चाहिये था

मैंने अपने बाल काले कर लिये

अब मेरे पास काम की कमी नहीं है

मैं लोगों को काम दिलवाती हुं |