रविवार, 2 फ़रवरी 2014

शराब तू बड़ी बुरी

कितने मजबूर हुए हम 
शराब के हाथों 
एक बार शौक में 
जो थाम लिये तेरा हाथ हम |

थके हैं हम

थक गये हम
अब तो लौट चले हम
बन गये बच्चे |

लौटना नहीं अब तो




गया काल
राजाओं का
अब न कोई अभिशप्त
लौटने को
राह आगे जाती है
परम्पराएं
परिमार्जित होती हैं
नींव नहीं हूं
घर की मैं.......
मैं तो
घर के प्रवेश द्वार का
दरवाजा हू
तोडना न मुझे
वर्ना
घर में घुस आयेगी काली आंधी |

शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

कामवाली

पल पल बदलें रंग
घर घर घूमें
चमकें
घर घर की बातें
चटखारा ले ले गपें
घर में पति की मार खा कर सह लें
चोरी करें
मालकिन के घर में
पकड़ में आने पर
काम छोड़ दें
मजबूरी में सहें हम
भला कैसे दया उपजे
ऐसे जरूरतमंदों पे
इतना छल भरा है
मन में
सबल के प्रति
तो
कसे उद्धार हो अभावग्रस्त का |

अनुगामिनी का सुख

औरत
है अनुगामिनी
लात खाए
या प्यार पाए पिया का
जिसे न मिला पति
वो क्या जाने
पति सुख
क्या ही भला लगे पीछे चलना
मुझे तो
मुसीबतों का भाला न चुभे
भला चेत कर क्यों जलूं
अपमान सह
सीता सी क्यों धरा में समाऊं मैं
हंस कर क्यों न जी लूं आज
इतरा लूं मैं आज अपने सुहाग पे
उतारूं आज
मैं नई सुहागन की आरती
जय हो
कल की कल सोंचेंगे |





ये माँ

आज विचारूं
मैं
उस माँ की छाती कैसी होगी
जो पुत्र प्रेम में विह्वल हो
अकेली पुत्री के लिए
जिसका दिल न रोता होगा
वारी जाऊं
उस माँ पर ....
जो अपमानित न हुयी
बेटी के अपमान पे |

एक प्रश्न पिताश्री से

पिताश्री !
जितना प्यार तुम्हें पुत्र पर है
उतना पुत्री पर रहता
तो
पुत्री का भविष्य
आज कुछ दूसरा होता
पुत्रियों के साक्षरता की संख्या न घटती
वे दासी न होतीं
काल गर्ल न बनतीं
रखैल न होतीं
और
कोई भी पुरुष
पत्नी की जरूरत के लिए
वर्षो क्वांरा न रहता
पिताश्री !
तुम तो दान कर
निज पुत्री का
तृप्त हो जाते हो
उसे भाग्य भरोसे छोड़ देते हो
उसकी समस्याओं से
मुंह मोड़ लेते हो
क्या तुमने कभी
अपनी पैतृक शान 
पुत्री को विरासत में दी
पुत्र की तरह ?
प्रश्न कर रही आज
हर स्वाभिमानी कर्मठ अभावग्रस्त पुत्री
निज पिताश्री से |