रविवार, 9 जून 2013

लड़ाकू

वह लड़ाकू था
वह लड़ रहा था निरंतर
मौसम से
लोगों की मिलती है धन दौलत
वसीयत में
उसे मिला था युद्ध कौशल |

चलते रहिये

सम्वेदनहीन बने रहिये
आगे बढ़ते रहिये
कंधे से कंधा मिलाईये 
मजबूत कदम रखते रहिये
सोंच विचार न कीजिये

बस चलते रहिये |

श्रद्धा


भय  से  उपजे  श्रद्धा
लोकलाज सींचे पौधा
खुश हूं
जय हो तेरी !
ओ मेरे कुलीन  प्राणी !

गुरुवार, 6 जून 2013

रेजा

मैं देखती थी
उस रेजा के चेहरे के स्वाभिमान को सदा
जो अपने बच्चों को स्कूल के लिए तैयार कर के
आती थी अपने काम पे
एवं भवन निर्माण के मध्यावकाश में
अपना टिफिन खोल
प्रतिदिन बांटती थी सब्जियां
अपने सहकर्मी कुली और मिस्त्रियों को
और मैं पढ़ती रहती  थी
मैं उन सहकर्मियों की आँखों की निरीहता
क्या इन पुरुष कर्मियों के घर में सब्जी पकाने वाली महिलाएं नहीं थीं
पर जिस दिन सुबह सुबह नये मजदूर रख
मालिक ने उन सब की छुट्टी कर दी
उस दिन का उस रेजा का अपमान से लाल चेहरा
आँखों में छुपी निरीह आशा की चिंगारी

भुलाये नहीं भूलती |

बुधवार, 5 जून 2013

सरकारी आफिस


बरसात में 
आफिस चूता है 
हम फाईल सूखे स्थान में रख 
पैर लम्बा करते हैं 
सूखे मौसम का सपना देखते हैं 
अब तो पसीना चूता है 
फाईल गीली होती है 
खिसके चश्मे को ऊपर सरकाते हैं |

मंगलवार, 4 जून 2013

क्यों रोयें भला


हंसने  का हुनर सीख
घर से निकले हम |

बाधाएं हैं पार किये 
विपदाओं से  क्यों डरें हम |

एक सपने की खोज में
पहाड़ पानी खेलें हम |

घोषित घरबार नहीं

हैं फक्कड़ राही हम |

रविवार, 2 जून 2013

वह और ख्वाब


छत पर पहुंचते ही
कट कर नीचे रह जाते हैं सारे रिश्ते
और रह जाते  हैं केवल उसके ख्वाब उसके साथ  |

तरह तरह के ख्वाब आने लगते हैं
मृत के ख्वाब के रुदन से ध्यान हटाने पर
अपाहिज ख्वाब सामने दयनीय खड़ा दिखने लगता है |

तभी दुखी मन से
एक  नया  ख्वाब जन्म लेता है
और प्रफुल्ल कर देता है उसके मन को |