शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

करुणा के पात्र


करुणा के पात्र हैं
वे युवा
जो आक्रामक बने
माता पिता को देख टूटते |

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

हैरत होती है !


हैरत होती है
उस पत्नी पर
बहकावे में कर जो पति के
करती है कन्या- भ्रूण हत्या |

हैरत होती है
उस माँ पर 
फुसलावे में आकर जो बेटे के
करती है अपना धन बहू के नाम |

हैरत होती है
उस लड़की पर
जो चाहती  है
सुख समृद्धि भावी पति द्वारा |

हैरत होती है
उस स्त्री पर
जो समझती
जीवन है उसके हक का मैदान |

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

माँ


स्वअर्जित मकान में
रहने वाली माँ
के लिए
भर जाती है
मुंह में चाशनी
लोकलाज के भय से |

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

रुका पल


स्वयं को पहचानिये
परहित कार्य कीजिये |
सर्वप्रिय कहलायिये 
दूसरों को न देखिये |
अपना कार्य कीजिये
फौलाद बन जाईये |

कर्म ही पहचान है
शान है आपकी यहाँ |
बस चलते जाईये
नए कर्म तलाशिये |
कर्महीन गिर गया
सबकी निगाह से ही |

आप मरे उसी पल
जब निकम्मे बने |
उठिए साँस लीजये
क्यूँ आसरा देखते |
चलनेवाला ही प्यारा 
रुका बस गया पूजा | 

पूजनीय बने तो क्या
जहाँ स्व ही  मृत है |
भले   डगमगायिये
अपनी पहचान बने |
और आपको तलाशे
कुछ ऐसा करें अब |

कोई नहीं है आपका
आप अपने हैं साथी |
शान करें  खुद  पर
जन्मे इस धरा पर |
देख आपकी खुद्दारी
लोग  कसमसायेंगे |

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

महत्वाकांक्षा


महत्वाकांक्षा ने
छुड़ा दिया अपनों का हाथ
अब कस कर थामें हैं
परायों को धन से |

माता


क्यूँ नहीं बैठी रहती
खा पी कर 
अपने कमरे में
मुझे नहीं भाती
तुम और तुम्हारी नसीहतें
क्यूँ नहीं जीने देती हमें
अब भी नहीं समझी
तुम्हारा समय गया
ठीक है पहुंचा दूँगा तुम्हें गाँव |

विद्यार्थी


विद्यार्थी सा सच्चा इंसान नहीं
पिता  सी  बड़ी   छाँव   नहीं |

माता  वृक्ष  न बन पाती
तोड़ लेते लोग उसकी पत्ती |
रोती स्त्री देख  लगता अच्छा
और देख प्यार बांटती  माता |

दूरदर्शन हमें  हमें  पढ़ाता
रोते बच्चे महिलाएं दिखाता |
हमें प्रफुल्लित  करता वह
हमें समाज का रूप दिखाता |

नयी पौध सोंच पाती
सदा ठगी सी  सोंचती |
जहाँ हम थे कल खड़े
वहीँ  देखते उन्हें आज खड़े |