शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

गुम हो रही तहज़ीब


 

 

तहजीब पलती है

 

रईसों के घर में

 

गरीब के घर में पलती है लडा़इयाँ

 

लड़की लड़ती है घर में

 

लड़का लड़ता है घर और बाहर दोनों जगह

 

वे लड़ते हैं

 

रोटी के लिए

 

खाट के लिये

 

लोग इन लडा़इयों  को समाज का परिवर्तन समझ लेते हैं

 

क्रांति समझने की भूल कर बैठते हैं

 

मिट जाती है

गरीब की भाषाएं और नस्लें

बंगाल के अकाल की तरह

 

कोई रईस कैद कर लेता है यह कहानी साहित्य के पन्ने में ।