तहजीब पलती है
रईसों के घर में
गरीब के घर में पलती है लडा़इयाँ
लड़की लड़ती है घर में
लड़का लड़ता है घर और बाहर दोनों जगह
वे लड़ते हैं
रोटी के लिए
खाट के लिये
लोग इन लडा़इयों को समाज का परिवर्तन समझ लेते हैं
क्रांति समझने की भूल कर बैठते हैं
मिट जाती है
गरीब की भाषाएं और नस्लें
बंगाल के अकाल की तरह
कोई रईस कैद कर लेता है यह कहानी साहित्य के पन्ने में ।