रविवार, 1 नवंबर 2026

पिता की उपस्थिति


 

 

अपनी कमाई का खाना है आजीवन

 

सिखाया नहीं पिता ने

 

उसे

 

ब्याह दिया

 

दूसरे की कमाई खाने , पहनने को

 

जरूरत भर खाया , पहना

 

न ही पिता से लेने का मन किया

 

योगी जीवन बन गया

 

ससुराल के खुशी के पल में पिता के दुख याद आये

 

एक एक पैसा जोड़ना याद आया

 

भटक भटक कर मेरे लिए सुपात्र तलाशना याद आया

 

अपने माता पिता के कष्ट आजीवन याद रहे

 

हर मुसीबत में पिता याद आये

 

मेरी बेटी को भी मेरे पिता याद आये

 

उसने अपने सुख दुःख में अपने  पिता की उपस्थिति नहीं महसूस की थी ।