गुरुवार, 3 सितंबर 2026

रेखाएं देखना चाहूं


खो गई मैं

 

अपने शब्दों मे

 

रचनाओं मे

 

महसूसा है मुझे

 

मेरे बेजुबान  मित्रों न

 

मकान की खिड़कियों दरवाजों और विशालकाय पेड़ों ने

 

मन तैरता है

 

बस यूँ ही

 

खोजता है जन्म का कारण

 

वृहद अभेद्य भुभुलैया सा मन

 

यात्रा करता रहता है अतीत से वर्तमान मे

 

भविष्य कुहासामय है

 

हथेली भीदिखे

 

रेखाएं कैसे पढ़ूं