अपने प्रिय की मौत की ही तरह
तोड़ देती है
सपनों की मौत भी इंसान को .....
बेहतर है
उसे रो लेने दो
जी भर के ।
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अपने प्रिय की मौत की ही तरह
तोड़ देती है
सपनों की मौत भी इंसान को .....
बेहतर है
उसे रो लेने दो
जी भर के ।
कैसी होती होगी वो उम्र
अजीब होती होंगी वे लड़कियां
सपने देखती होंगी जो
किसी लड़के का घर
सजाने का
आंगन में फूल खिलाने का ..........
आज साठ वर्ष की उम्र में
याद कर रही हूं
उन स्वप्निल लड़कियों को .......
काश
लड़कियां अपने मकान का सपना देखतीं ।
भूख है
टैक्स है
मंहगाई है
मकान की कमी है
डिजिटल पेमेंट कौन ले और कौन दे
हाथ में सब्ज़ियो के पैसे चाहिए
डोसा के पैसे चाहिए
समोसे के पैसे चाहिए
चाय के पैसे चाहिए
पेट्रोल के पैसे चाहिए
घर खर्च चलाना है
दवा के पैसे चाहिए
रिश्ते तो भूल गए
मां बाप को भी भूलने लगे हैं
पत्नी तो दूसरे घर की है
पति तो दूसरे घर का है
अपने बच्चों के लिए जद्दोजहद कर रहे हम
सभ्यता की ओर अग्रसर हो रहे हम
जी रहे हैं हम
रीढ़ मजबूत है
लड़ रहे समय से हम
कमा रहे हैं
पैसे ला रहे हैं
पैसों से घर है
पैसों को धूल समझना साहित्य ने सिखाया है
पैसों से ही हम हैं
हमारी नस्लें हैं ।
पार्क में खदबदाये विचार
जा रही हूं शहर से
मोह है
शहर छूटता जा रहा है........
शहर से निकल पा रही हूं
जीवित हूं तभी न
आगे बढ़ रही हूं
कुछ अंतराल पर रुकावटें आ जाती हैं
सामने अंधियारा हैं
एक दीपक जल रहा है
उसी ओर बढ़ना है
राह की कंटीली झाड़ियां काटनी है
भिड़ना है बनैले पशुओं से
झाड़ियां काटनी है
बढ़ते जाना है
बढ़ते ही जाना है
अंतराल आते रहें
राह में
कोई भय नहीं ।
देखती हूं
आमदनी कम है
पर
खूबसूरत मकान है कुछ लॉगों के पास
उनके पूर्वजों के मकान है उनके पास
खूबसूरत मकान में रहते हैं वे
छत की उन्हें चिंता नहीं
आखिर क्यों भटकती हूं मैं
मकान की तलाश में
कमाते हुए जीवन कटा
किराए देते देते प्राण सूखते रहे
दिन कटते रहे ।
पुरुष अहंकारी होते हैं
संबंध कोई भी हो
सत्ता हस्तांतर नहीं करते हैं
निकटस्थ महिला को.....
यह ज्ञान
पुस्तकों से नहीं
अनुभव से पाया
जीवन संध्या ज्ञात कराई
सारा जीवन
आनंद नहीं प्रयोगशाला रहा ।
दुकान से चार सेट हार खरीद कर चढ़ा दिये दुल्हन पर
दुल्हन घर आई
ले लिया पति महोदय ने तीन हार
कहा
बहन के लॉकर में रख दूंगा
ब्याह हुआ घर में
दुल्हन का इकलौता हार बिक चुका था
ननद ने अपना हार दिया पहनने को अपनी भाभी को
भाभी तमकी
मेरा हार दो
मैं क्यों तुम्हारा हार पहनूं
रो दी ननद
पिता के सामने
कितना बदनाम किया था भाई ने बहन को ।
......................
नई दुल्हन आई थी
दबे जबान में ससुर कहने लगे
ब्याह तय होते समय लड़की ने कहा था
घर में ननद है
वो ससुराल में नहीं रहेगी ब्याह के बाद ।
कितना भी बराबरी कर ले पिता
अपने बेटे बेटी में
उनके बचपन में
पर
बेटी को विदा कर
अपने मकान से बेदखल कर देता है वह
अपनी बेटी को
बेटा ही उसका अपना है
बेटी नहीं
इसे पितृसत्ता न कहूं तो क्या कहूं
बताओ जरा ।
अब
तुम
नहीं करोगे अपने मन का
अब ज्यादा दूर जाना ठीक नहीं
और कितना बिखरोगे तुम
कमजोर हुई हैं
पाँखे तुम्हारी
मन के जोश से उड़ेगा पंछी
तो राह में गिर जाएगा .....
अब सुनना है तुम्हें अपने पिता की ...अपनी मां की
श्रम करो
नीड़ बनाओ
पास के पेड़ पर
जियो
खुश रहो ।