- इंदु बाला सिंह सिंह
इतिहास देखा
और देखा मैंने वर्तमान .......
औरत ! तुम माँ हो ... मात्र सेविका हो ...... अपनी सन्तति ...... पुत्र या पुत्री की .... मित्र नहीं .....
तुम्हारा सेविका रूप ही समाज में मान्य है ......
ओ री औरत ! देख जरा दर्पण ........
क्या तुममें अपना अस्तित्व तलाश पाने की चाह है ?
अगर हाँ
तो
बनो योद्धा ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें