याद आया
सन 1999 में जगह जगह घूमते ग्रामीण
मांगते कपड़े
पैसे
दुहाई देते
बाढ़ की
हम लोग किसान
हैं
सब
बह गया बाढ़ में
माँ ! हम
भिखारी नहीं हैं |
बस से आ गये
थे शहर
बाढ़ग्रस्त
गांवो के निवासी भटक रहे थे
जीविका की
तलाश में |
इस बार की बाढ़
में भी तो
समंदर ने लील
लिया है खेत किसानों के
जो खेत बचे
हैं बंजर हैं
क्या खिलाएंगे
अपने मालिकों को
शहर में
सुरक्षित बैठा मन
है चिंतामग्न
!
भूखा किसान
हमें क्या खिलायेगा
दूरदर्शन की
खबरों से परेशान
दो वर्षीय
पुत्री बोल उठी ...
हम मैगी
खायेंगे !
दूध नहीं
मिलेगा तो
कोल्डड्रिंक
पीयेंगे |
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