घने कोहरे में
उभरता तेरा
अक्श
कोहरे में ही
विलीन हो
जाता है
काश
!
निकलकर आती वह आकृति
कोहरे से बाहर
और घंटों बतियाती
सुख दुःख |
कितने अकेले हो जाते हैं
हम
इस भागमभाग
में
अपनी
जुझारू दिनचर्या में |
क्यों नहीं सीखता इंसान
जीना राह में
एक गंतव्य से दूसरे गंतव्य तक
जाते वक्त |
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