बुधवार, 15 जुलाई 2020

रंगबिरंगा शहर


27/06/20
04:45
-इन्दु बाला सिंह
तेरी दुनिया
तुझी को मुबारक
मुझे न भाये तेरी बस्ती......
तेरी दुनिया
सरल को ठगे
सीमारेखा की लांघ में आनंद पाये.....
मैं
छोटे शहर की
मेरी आकांक्षाएँ छोटी ,सुख- दुःख छोटे ......
मैं
खुश हूं ..... संतुष्ट हूँ
रोज़ के भागम भाग से मुक्त हूँ ।

बेटियों से एक सवाल !


12:42 pm
02/07/20
-इन्दु बाला सिंह
राजाओं को उपहार में दास और दासियाँ दी जाती थीं
मानों दास , दासियाँ खूबसूरत वस्तुएँ हों
गजब काल था वह........
आज गरीब की बेटियाँ बेची जाती हैं
भले घर में पिता -माता द्वारा बेटियाँ दान की जाती हैं
आज भी बेटियाँ सामान हैं ........
बेटियों में जागरण क्यों नहीं ?
बेटियों से एक सवाल है -
“ क्या वे सामान बने रह कर खुश हैं ? “

औरत


10:46
06/07/20
-इन्दु बाला सिंह
समझदार ... औरतों से उनकी उम्र नहीं पूछते
मैंने आइना देखना .... वर्षों पहले छोड़ दिया था
मैं आजीवन कर्मठ रह पायी ।

होने का मोह


06:54
11/07/20
-इन्दु बाला सिंह
मैं न रहुंगी
तो
जग कैसा होगा
मेरे अपने कैसे रहेंगे ......
मुझे
मेरे पिता याद आये ।

काम चाहिये


09:00 AM
15/07/20
-इन्दु बाला सिंह
आज फिर रेल के प्लेटफ़ार्म पर खड़ा हूं
मैं सपरिवार......
दो माह पहले लौटा था अपने घर
कभी न लौटने के लिये तेरे देश.....
मोह भंग हुआ .....
पैतृक मकान खाना नहीं देता
दैनिक मज़दूर हूं
गाँव में यादें हैं
खाना नहीं
काम नहीं ।

शनिवार, 15 फ़रवरी 2020

यह भी एक रेस


- इंदु बाला सिंह


हद से ज्यादा प्यार किया

उसने ....


मां के हिस्से का ही नहीं

पिता के हिस्से का प्यार भी देना जरूरी समझा ....

कहीं तो कुछ भूल हुई

कि

सम्मान न मिला

प्यार न मिला

मिला

मात्र अकेलापन ....

आदमी भी गजब का जीव है

ज्यों ज्यों

वह

ऊंचा उठता जाता है

त्यों त्यों

वह

अकेला होता जाता है ....

गजब की रेस है

इंसानी जीवन की

पल भर की फुर्सत नहीं सुस्ताने की उसे ...

कहीं कोई आगे न निकल जाय उससे ।

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

बढ़ चलो


-इंदु बाला सिंह


आग ले चलो

चिराग ले चलो

अपनी कर्मठता के फ़ाग ले चलो

बढ़े चलो .....बढ़े चलो ।