सोमवार, 14 सितंबर 2026

मोह

 

 

नदी के इस पार खड़ी  हूं

 

जला दिया है लौटने का पुल खुद मैने

 

निहारूं मैं पुराना भग्नावशेष

 

जितना भी दौड़ूँ

 

आगे न बढ़ पाउं

 

यह कैसा मोह है पुरातन का

 

बढ़ने न दे आगे

 

बदबू भीमहसूस कर पाऊं

 

संबंधों के सड़ेपन की ।

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