सोमवार, 29 दिसंबर 2025

हाथी शहर में


 

 

 

रोज की तरह वह उठी

 

सब कुछ सामान्य था सड़क पर

 

बरामदों में बत्तियां जल रहीं थीं

 

कोहरा के कारण एक मीटर से ज्यादा दूर तक सफेद चादर छाई थी

 

दूर से कोई चला आ रहा था

 

छोटी मनुष्य की आकृतियां भी पास आती दिख रहीं थीं

 

सड़क के कुत्ते कहीं दुबके पड़े थे

 

गाएं कचरे के ढेर में खाना ढूंढ रही थी

 

वह बस चलती चली जा रही थी

 

सुबह की सैर स्फूर्ति पैदा करनेवाली होती है

 

दूर से एक विशालकाय  साया तेजी से दौड़ता आ रहा था

 

जब तक वह कुछ समझे

 

उसे कुचल कर चला गया

 

बच्चे को सरकारी मुआवजा पंद्रह लाख मिला

 

हाथी शहर की सड़क पर कैसे पहुंचा

 

सरकारी कर्मचारी परेशान हैं ।

 

मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

रेल का यात्री



मीडिया ने परिचय कराया तुमसे

जब तक तुम्हें पहचानूं

समझूं

तुम उतर गए स्टेशन पर

निशानियां छोड़ गए 

बातें कर पाने के सुख से वंचित कर गए 

अभी कितना कुछ सीखना था मुझे तुमसे

तुम मील का पत्थर बन कर रह गए 

लोग कहते हैं 

तुम जिंदा हो अपनी रचनाओं में 

न तो भाया मुझे इतिहास 

और 

न ही इतिहास पुरुष 

भूल जाऊंगी तुम्हें एकदिन 

तुम बिंदु बन चिपक जाओगे काल के कपाल पर ।

एक #चिट्ठी जो लिख कर रख दी गई ।


शनिवार, 13 दिसंबर 2025

देवी के देश में


 

 

कचड़े में खाना ढूंढती गाय

 

बेटे के घर के पिछले कमरे में गठरी बनी मां

 

गांव में छूटी पत्नी

 

इलेक्शन के समय याद आतीं है

 

वैसे हम रोज देवी के सामने धूप जलाते है

 

घंटी भी बजाते है

 

एन जी ओ भी सम्हालते है

मंगलवार, 9 दिसंबर 2025

लड़कियां


 

 

एक पुश्त को आजादी न मिली

 

दूसरी को अभाव मिला

 

तीसरी को मात्र कमाना खाना मिला

 

तीनों पुश्त ने श्रम किया मजदूर की तरह

 

किसी पुश्त को वसीयत में मकानमिला

 

लड़कियां थीं न ।

औरत और बकरा


 

 

औरत बचा लेती है समय अपने लिये

 

रात उसकी अपनी होती है

 

कोई कोना तलाशती है वह

 

और

 

अकेली बैठती है

 

यह उसका अपना साम्राज्य है

 

जिसकी वह मालकिन है

 

यादें उतरतीं हैं उसके सामने

 

कभी वह उन्हें चित्रबद्ध करती है

 

तो कभी लेखनबद्ध

 

दिमाग खाली हो।जाता है

 

फिर बीज पड़ते है

 

निकली कोंपल को

 

करे के डर से

 

पिंजड़े में रख सो जाती है ।

गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

दिन के बाद


 

 

रात आती है

 

विश्राम का सुख देने

 

यादें भी आ जातीं हैं चुपके से

 

रात गहराने लगती है

 

और दूर से सन्नाटे में सुनाई देती है

 

रेल की सीटी ... 

 

गड़गड़ाते हुये रेल डिब्बे भी गुजर जाती है

 

आंखों के सामने कौंध जातीं हैं उन की लाइटें ....

 

रेल ले जाती है मुझे

 

उन शहरों मे

 

जहां मैं बरसों पहले गई थी

 

धीरे धीरे दिमाग थकने लगता है ।

 

बुधवार, 3 दिसंबर 2025

बेटा जन्मा


 

 

विधुर

 

ठग कर पढ़ी लिखी लड़की से ब्याह किया

 

मैट्रिमोनियल के माध्यम से

 

पहले से दो बेटियां थीं पत्नी के उम्र की

 

संतान जन्मी

 

पुत्र जन्म की खुशीनाई उसने

 

कॉलेज पहुंच न सका

 

 बुरी संगत में पड़ गया लड़का

 

पिता से लड़ता था

 

नशा करता था

 

मां को मारता था

 

बोझ बन गया बेटा पिता पर

 

और एक दिन

 

पिता की आंखों के सामने गुजर गया