रविवार, 20 अप्रैल 2025

अंतिम समय में तानाशाह

 


 

अपने अंतिम समय में तानाशाह मार दिया जाता है

 

या

 

अकेला रह जाता है

 

अपने मन और तन के बोझ के साथ ।

बुधवार, 16 अप्रैल 2025

वह निकम्मी नहीं है

  


 

 

 

वह होश सम्हालते ही भाई को गोद में लेने लगी

 

माँ खाना बनाती थी

 

जब बड़ी हुई तो वह खाना बनाने लगी

 

ब्याह हुआ

 

तो ससुराल में खाना बनाने लगी

 

बेटा बड़ा हुआ

 

तो बेटे के घर में खाना बनाने लगी

 

और

 

वह खुश है

 

वह निकम्मी नहीं है




रविवार, 13 अप्रैल 2025

बहन की तेरही

  

 

 

यूँ ही नहीं कहानियाँ नहीं है कही जातीं हैं कहानी

 

कंस मामा की

 

आज भी है  कंस मामा

 

छूने नहीं देता बहन के परिवार को पैतृक संपत्ति

 

कुटिल हो कहता है

 

नहीं मिलती बेटी को संपत्ति

 

समाज के आँख पर पट्टी बँधी है

 

तृप्त होता है आज भी कंस मामा

 

बहन के मौत पर

 

तेरही पर भी नहीं जाता

 

अच्छा हुआ हक़दार ने आँखें मूँदी

 

 


शनिवार, 5 अप्रैल 2025

हक़ के संग रिश्ते ख़त्म

  

 


 

 

पैतृक संपत्ति ने बांध के रखा था

 

भाई बहन को

 

मकान की मरम्मत जरूरी थी

 

बहन ने हक त्यागा

 

उसे एक साड़ी और मिठाई मिली लौटते वक्त

 

उम्र बढ़ गई थी बहन की

 

साड़ी बाँधना मुश्किल था

 

डाइबिटीज से पीड़ित बहन ने अपनी मिठाई और साड़ी कामवाली को दे दी

 

हक खत्म हुआ

 

रिश्ते बिखर गये


मंगलवार, 1 अप्रैल 2025

दुःख की लड़ी



#इन्दु_बाला_सिंह


बेटी ने अपनी असफलता का ठीकरा माँ पर फोड़ा 


बेटे ने अपनी पारिवारिक वैमन्ष्य का जिम्मेवार माँ को बताया 


माँ हाउस वाइफ ही रही 


होम मेकर न कहला पाई 


पति के लिये पत्नी बच्चे पैदा करनेवाली और कामवाली थी 


आख़िर कितना ज़िम्मा उठाना पड़ता था पति को 


अब गाँव नहीं कि घर के काम ज़्यादा थे 


शहर में रहती थी माँ 


सुविधाभोगी कहलायी सदा 


ख़ुद लड़ झगड़ के कमाने न निकल पड़ी 


पति के गुज़रने पर माँ अकेली हो गई 


और 


माँ के गुज़रने पर बेटा 


बेटी तो ब्याहता थी 


आबाद रही 


पर 


वह भी कमाऊ न बनी 


दुःख की लड़ी न काटी बेटी ने भी ।



फ़क़ीर महिला



#इन्दु_बाला_सिंह


लड़की 


बचपन में पिता के दान पर पली 


बड़ी हुई तो बोझ बनी 


दान की गयी 


पर पुरुष को 


अब यहाँ अहसान और दान का खा रही थी वह 


वृद्धावस्था में बेटा के दान का खाने लगी .…


बेटी खुद दान का खा रही थी 


वह दान देने के काबिल ही नहीं थी 


लड़कियाँ फ़क़ीर होतीं हैं 


भटकती रहतीं हैं 


अन्न के लिये ।