गुरुवार, 5 मार्च 2026

जीवन संध्या में गृहणी

 

 

थका हारा मेरा मन

 

कभी खुद

 

तो

 

किसी के कहने पर मजबूरी में

 

घर में

 

देवी देवताओं के पूजन के कर्मकांड लगा रहता है

 

हर दिन किसी न किसी देवी देवता का है

 

थक जाती हूँ मैं

 

रसोई और रिश्तों का सम्हालते

 

अपने लिए कोई समय नहीं

 

इतना करने पर भी मुझम ही कमी है लोगों की निगाह मे

 

आज सोचूँ मैं

 

क्या हर अपने काम के बाद  ईश्वरीय बंदन मौन हो के क्यों नहीं किया

 

क्यों मैने दूसरों की नकल किया

 

क्यों अपना समय कर्मकांड में खोया

 

धनोपार्जन के बारे में न सोंचा

 

क्यों निर्भर रही आजीवन

 

किसी के पैसों और मका के सहारे जीवित रही

 

 

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