मंगलवार, 31 जनवरी 2012

एक औरत

वह औरत एक गृहणी थी
है भी 
कह सकते हैं ।
पति के साथ 
जीवन कटा 
घर या कहिये मकान बना ।
अब वह तैयार नहीं 
बेटे की कमाऊ पत्नी का घर 
बच्चे सम्हालने को ।
जीवनसंध्या में 
जिम्मेदारी !
कभी नहीं ।
पति रह लें 
सम्हालें बेटे के बच्चे 
अब और नहीं । 
अपना घर ,मकान 
अपना मान
अपना जीवन  है ।
जी रही है वो 
स्वाभिमानिनी 
लोगों की ईर्ष्या की पात्र ।
आजादी सुरक्षित रखना 
एक मनोबल 
एक अहसास है ।

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

एक प्रश्न

           
विद्यालय में पढ़ा 
आसमान छूती महिलाएं ।
अख़बार दिखाते 
अपराध ,भ्रस्टाचार ,सनसनीखेज खबरें ।
साहित्यकार दिखाते 
रोती माँ, बहन ,टूटा समाज ।
समझौता करने लगता है मन 
रोना ही है नियति उसकी ।
पर मुस्कराएगी वह 
भले ही रोये मन ।
दया की पात्र नहीं बनेगी वह 
भले ही खंडित हो जाय।
आखिर क्यों मीडिया बहादूरी की खबरों से
नहीं रंगे जाते 
और अपराध पाता एक थोड़ी सी जगह ?
आखिर क्यों ?

गरीब

        

नैतिकता का पाठ 
विद्यालय में लगता है अच्छा
अभावग्रस्त घर में नहीं ।
छोटे छोटे झूठों के सहारे 
मुस्कराते भरे पूरे सफल रिश्ते 
खुशहाल घर 
चिढाते हैं मुंह।
कहाँ से हम करप्सन 
करेंगे दूर ।
जिसने दी रोटी 
उसी के हो लिए ।
इलाज तो है अमीरों की बपौती 
सपना भी देखते नहीं ।
हम स्त्री पुरुष मजदूर हैं 
हम सड़क दुर्घटना में मरते हैं 
या जीवनसंध्या में 
घरों के सामने घरों के सामने हो जाते हैं खड़े 
मिली भीख के बदले 
देते हैं आशीष ।

रविवार, 8 जनवरी 2012

सफेदपोश जन्मदाता की बुद्धिमानी

   

   खाली कमरे में इतना रोता है मन
   कि भरे  कमरे में
   सूने नयनों से
   निकलती हैं चिंगारियां |
   समाज के निश्चित चौखटों  में फिट होने हेतु
   मां बाप द्वारा बनायीं गयी सजीव  आकृतियाँ
   चौखटों के टूटते ही
   दिग्भ्रमित होने  लगती हैं
   और बनने लगती हैं ...आतंकवादी या समाज का  कोढ़ |
   क्यों न इन्हें स्वयंसिद्धा बनने दिया जाय ?....
    प्रश्न उठाता है कोई |
   जीवन के अँधेरे में चलती ये आकृतियाँ 
   प्रतीत होती हैं किसी पिशाच की सेना ...
   और तब विश्वास होने लगता है 
   काली शक्ति के अस्तित्व का |
  ओझाओं की बन जाती है चांदी |
  वे भी जीने  लगते हैं |